By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर जिले के ठाढ़ीदुलमपुर स्थित मां जगदंबा कॉलोनी इन दिनों भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक चेतना के दिव्य वातावरण में सराबोर है। गंगा विश्वशांति सद्भावना धाम के तत्वावधान में प्रेम मंदिर परिसर में आयोजित नौ दिवसीय गंगा अष्टादश महापुराण यज्ञ सह श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिन सोमवार को आस्था और भक्ति का विराट संगम बनकर सामने आया। सुबह की पहली किरण से लेकर देर शाम तक पूरा क्षेत्र वेद मंत्रों, हरिनाम संकीर्तन और भगवान के जयघोष से गुंजायमान रहा। इस धार्मिक आयोजन में न केवल देवघर शहर बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। आयोजन स्थल पर आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा वातावरण बना कि हर श्रद्धालु स्वयं को भक्ति रस में डूबा हुआ महसूस करता नजर आया।

वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ अनुष्ठान का शुभारंभ
छठे दिन की शुरुआत वैदिक परंपरा के अनुसार विधि-विधान से संपन्न यज्ञ अनुष्ठान से हुई। विद्वान आचार्यों और पंडितों द्वारा सस्वर वेद मंत्रों के उच्चारण के बीच श्रद्धालुओं ने हवनकुंड में आहुति अर्पित की। घी, समिधा, नवधान्य और नैवेद्य की आहुति के साथ वातावरण पूर्णतः पवित्र और आध्यात्मिक हो उठा।
“स्वाहा” की ध्वनि के साथ उठती अग्नि की लपटें और हवन की सुगंध ने पूरे परिसर को दिव्य अनुभूति से भर दिया। श्रद्धालुओं ने लोककल्याण, विश्वशांति, परिवार की सुख-समृद्धि और समाज में सद्भाव की कामना करते हुए यज्ञ में सहभागिता निभाई।
आयोजन समिति द्वारा की गई अनुशासित व्यवस्था के कारण श्रद्धालुओं को बिना किसी अव्यवस्था के शांतिपूर्ण ढंग से यज्ञ में शामिल होने का अवसर मिला।

मंदिरों में दर्शन के लिए लगी श्रद्धालुओं की लंबी कतार
प्रेम मंदिर परिसर स्थित नव-निर्मित श्री श्री राधा-कृष्ण मंदिर, मां जगदंबा मंदिर और भगवान शिव मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने रहे। सुबह से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग गईं।
उत्तराखंड से पधारे आचार्यों ने विधिवत पूजन-अर्चन कर मंदिर के पट खोले, जिसके बाद दिनभर दर्शन का क्रम जारी रहा। भक्तजन पुष्प, फल, नारियल और प्रसाद अर्पित कर आराध्य के समक्ष नतमस्तक होते दिखाई दिए।
विशेष रूप से महिलाओं और कन्याओं की बड़ी भागीदारी ने आयोजन को भव्य आध्यात्मिक उत्सव का स्वरूप प्रदान किया। कई श्रद्धालु परिवार सहित उपस्थित होकर धार्मिक वातावरण का आनंद लेते नजर आए।
राधा-कृष्ण की रासलीला ने बांधा समां
धार्मिक आयोजन के अंतर्गत वृंदावन से आए कलाकारों द्वारा प्रस्तुत राधा-कृष्ण की रासलीला श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही। मधुर भजनों, पारंपरिक वेशभूषा और भावपूर्ण अभिनय ने भक्तों को वृंदावन की आध्यात्मिक अनुभूति करा दी।
भक्ति संगीत की धुन पर श्रद्धालु ताली बजाते और भजन गुनगुनाते हुए भावविभोर दिखाई दिए। कई श्रद्धालु आंखों में आंसू लिए भगवान की लीलाओं का रसास्वादन करते नजर आए।

कथा मंच से गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व
अपराह्न तीन बजे से प्रारंभ हुई श्रीमद्भागवत कथा में राष्ट्रीय संत डॉ. दुर्गेश आचार्य ने विष्णु पुराण के गूढ़ रहस्यों का सरल और प्रेरणादायक वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि गुरु जीवन का मार्गदर्शक होता है और गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर जीवन में प्रकाश लाते हैं। आधुनिक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मोबाइल को चार्ज करना आवश्यक है, उसी प्रकार मनुष्य को आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए गुरु के सान्निध्य की आवश्यकता होती है।
उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा गुरु-शिष्य परंपरा में निहित है, जो समाज को नैतिकता, अनुशासन और संस्कारों से जोड़ती है।
अठारह महापुराणों में विष्णु पुराण का विशेष महत्व
कथा के दौरान उन्होंने विष्णु पुराण की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अठारह महापुराणों में विष्णु पुराण अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
इस ग्रंथ में सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और प्रलय का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की योगनिद्रा से ब्रह्मा की उत्पत्ति, कल्प और मन्वंतर की अवधारणा, सात द्वीप और सात समुद्र का वर्णन शास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने सूर्य, चंद्रमा और ग्रह-नक्षत्रों की संरचना, जम्बूद्वीप तथा भारतवर्ष के आध्यात्मिक महत्व को भी विस्तार से समझाया।

वर्ण और आश्रम व्यवस्था का सामाजिक संदेश
विष्णु पुराण में वर्णित सामाजिक व्यवस्था पर चर्चा करते हुए उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्तव्यों का उल्लेख किया। साथ ही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की महत्ता को समझाते हुए कहा कि यह व्यवस्था समाज में संतुलन और अनुशासन स्थापित करने का माध्यम है।
उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य समाज को जोड़ना और मानव जीवन को मर्यादित एवं संतुलित बनाना है।
श्रीराम और श्रीकृष्ण की लीलाओं का प्रेरक वर्णन
कथा के दौरान भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों का वर्णन करते हुए श्रीराम और श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया। श्रीकृष्ण जन्म, बाल लीलाएं, कंस वध, गोवर्धन धारण तथा महाभारत के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
कथावाचक ने कहा कि भगवान के अवतार मानवता को धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का संदेश देते हैं।
कलियुग में भक्ति ही मोक्ष का सरल मार्ग
डॉ. दुर्गेश आचार्य ने अपने प्रवचन में कहा कि कलियुग में धर्म का क्षय स्वाभाविक है, किंतु भगवान का नाम-स्मरण और भक्ति ही मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल उपाय है।
उन्होंने बताया कि विष्णु पुराण का श्रवण करने से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, सामाजिक सद्भाव और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक पुराण श्रवण करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।
समिति की सेवा भावना बनी आयोजन की सफलता का आधार
इस नौ दिवसीय धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में गंगा विश्वशांति सद्भावना धाम, देवघर की समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अध्यक्ष महेश प्रसाद राय के नेतृत्व में पूरी टीम ने अनुशासन और सेवा भावना के साथ व्यवस्थाओं का संचालन किया।
उपाध्यक्ष अजीत कुमार राय, मुख्य संयोजक बिहार-झारखंड सह मुख्य यजमान कृष्ण कन्हैया राय, सचिव सह मुख्य यजमान अमरेश कुमार सिंह, कोषाध्यक्ष रंजीत झा, उपकोषाध्यक्ष मनीष कुमार सहित सभी सदस्यों ने सक्रिय योगदान दिया।
श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद वितरण, बैठने की व्यवस्था, पेयजल, सुरक्षा और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा गया।
आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हुआ पूरा क्षेत्र
गंगा अष्टादश महापुराण यज्ञ सह श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिन भक्ति, आस्था और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम बनकर संपन्न हुआ। ठाढ़ीदुलमपुर सहित आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक उत्साह चरम पर देखा गया।
श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति एवं सनातन परंपराओं से जोड़ते हैं।
आगामी दिनों में कथा की पूर्णाहुति को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह बना हुआ है। आयोजन स्थल प्रतिदिन आध्यात्मिक मिलन केंद्र बनता जा रहा है, जहां भक्ति, संस्कृति और सामाजिक एकता का सुंदर समन्वय देखने को मिल रहा है।
इस प्रकार यह धार्मिक अनुष्ठान केवल एक आयोजन नहीं बल्कि श्रद्धा, संस्कार और आध्यात्मिक जागरण का जीवंत उदाहरण बनकर क्षेत्र में सनातन संस्कृति की ज्योति प्रज्वलित कर रहा है।

