By:Vikash Kumar (Vicky)
भारत और ईरान के बीच व्यापारिक रिश्ते दशकों पुराने हैं। ऊर्जा, खाद और रणनीतिक परियोजनाओं के जरिए दोनों देशों के संबंध मजबूत रहे हैं। लेकिन यदि मध्य-पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत ईरान से क्या-क्या आयात करता है और जंग की स्थिति में किन वस्तुओं की कीमतों में उछाल आ सकता है।

सबसे पहले बात कच्चे तेल की। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का लगभग 80-85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ईरान भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ईरान से तेल आयात कम कर दिया था, लेकिन वैश्विक बाजार में ईरान की मौजूदगी तेल की कीमतों को प्रभावित करती है। यदि ईरान-इजरायल या ईरान-अमेरिका के बीच संघर्ष बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों पर पड़ेगा।

दूसरा बड़ा आयात यूरिया और अन्य उर्वरकों का है। भारत अपनी कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में यूरिया आयात करता है। ईरान प्राकृतिक गैस का बड़ा उत्पादक देश है और गैस आधारित यूरिया उत्पादन में उसकी भूमिका अहम है। युद्ध की स्थिति में आपूर्ति बाधित होने पर खाद की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे किसानों की लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्यान्न कीमतों पर भी दिख सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है पेट्रोकेमिकल्स। प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर और रसायन उद्योग के लिए जरूरी कच्चा माल ईरान से या ईरान प्रभावित बाजार से आता है। यदि आपूर्ति में रुकावट आती है तो प्लास्टिक उत्पाद, पैकेजिंग सामग्री और ऑटोमोबाइल पार्ट्स महंगे हो सकते हैं।

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश किया है। यह परियोजना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच के लिए महत्वपूर्ण है। यदि क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो इस परियोजना पर भी असर पड़ सकता है और व्यापारिक मार्ग प्रभावित हो सकते हैं।
अब बात करें आम आदमी पर असर की। यदि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे। इससे ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी और फल-सब्जियों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं। एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी इजाफा संभव है। हवाई यात्रा महंगी हो सकती है क्योंकि एविएशन टर्बाइन फ्यूल भी तेल से जुड़ा है।

सोने की कीमतों पर भी असर देखने को मिल सकता है। वैश्विक अनिश्चितता के दौर में निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की ओर रुख करते हैं। इससे सोने की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर भारत जैसे बड़े सोना उपभोक्ता देश पर पड़ेगा।
रुपये की स्थिति भी कमजोर हो सकती है। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण आयात बिल बढ़ेगा, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव आएगा और डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत गिर सकती है। कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं को और महंगा बना देगा।
सरकार के लिए भी यह चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी। यदि ईंधन महंगा होता है, तो सरकार को टैक्स में कटौती या सब्सिडी का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। महंगाई दर बढ़ने से रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी दबाव पड़ेगा।

हालांकि, भारत ने हाल के वर्षों में अपने तेल आयात स्रोतों में विविधता लाई है। सऊदी अरब, इराक, रूस और अमेरिका जैसे देशों से भी भारत बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। इसके बावजूद, मध्य-पूर्व में अस्थिरता का असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है, जिससे भारत पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध सीमित दायरे में रहता है, तो असर अस्थायी हो सकता है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है और होरमुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो तेल आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित हो सकती है। इससे वैश्विक मंदी का खतरा भी बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, ईरान से भारत का व्यापार केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स और रणनीतिक परियोजनाएं भी इससे जुड़ी हैं। जंग की स्थिति में इन सभी क्षेत्रों पर असर पड़ेगा और आम आदमी को महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। आने वाले समय में सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।

