

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले चुनाव आयोग ने बड़ी कार्रवाई की है। इस कार्रवाई में राज्य की 42 पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन पार्टियों ने तय नियमों का पालन नहीं किया, समय-समय पर मांगी गई जानकारी नहीं दी और सक्रियता नहीं दिखाई, उनका पंजीकरण निरस्त किया गया है। इस कदम से बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
चुनाव आयोग का फैसला क्यों अहम?
बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग का यह निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग का कहना है कि पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव कराना उसकी प्राथमिकता है। ऐसे में जिन राजनीतिक दलों ने चुनावी गतिविधियों में सक्रियता नहीं दिखाई और वित्तीय रिपोर्ट, संगठनात्मक विवरण व आवश्यक कागजात जमा नहीं किए, उन्हें चुनावी प्रक्रिया से बाहर करना जरूरी था।
चुनाव आयोग की इस कार्रवाई के बाद अब बिहार में मान्यता प्राप्त और सक्रिय पार्टियों की संख्या पहले से कम हो गई है। इससे चुनावी मुकाबले में मुख्य पार्टियों को ही ज्यादा बढ़त मिलेगी।
किन कारणों से रद्द हुआ रजिस्ट्रेशन?
चुनाव आयोग के सूत्रों के मुताबिक 42 पार्टियों के रजिस्ट्रेशन रद्द करने के पीछे कई अहम वजहें सामने आई हैं:
1. गतिविधियों में निष्क्रियता – लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया में भाग न लेना।
2. फंडिंग और वित्तीय रिपोर्ट जमा न करना – तय समय सीमा में आय-व्यय का ब्यौरा न देना।
3. संगठन की जानकारी न देना – अध्यक्ष, पदाधिकारियों व संरचना की रिपोर्ट प्रस्तुत न करना।
4. जनाधार न होना – जनता से जुड़ी गतिविधियों में सक्रियता की कमी।
बिहार चुनाव पर क्या होगा असर?
बिहार में पहले से ही राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल यूनाइटेड (JDU), भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस और वाम दलों का मजबूत आधार रहा है। अब जब छोटी और निष्क्रिय पार्टियां चुनावी मैदान से बाहर हो गई हैं, तो मुकाबला मुख्य रूप से बड़े गठबंधनों तक ही सीमित हो जाएगा।
इसका सीधा असर यह होगा कि मतदाताओं के सामने विकल्प सीमित होंगे। वहीं बड़ी पार्टियों का वोट शेयर बढ़ सकता है। छोटे दलों के हटने से सीटों का समीकरण भी बदल सकता है, जिससे महागठबंधन और NDA दोनों अपनी रणनीति को नए सिरे से तय करेंगे।
2025 के चुनाव का बदलता समीकरण
बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। चुनाव आयोग पहले ही राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू करने की तैयारियों में जुट गया है।
NDA – भाजपा और जेडीयू मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
महागठबंधन – आरजेडी, कांग्रेस और वाम दल साथ हैं।
अन्य पार्टियां – एआईएमआईएम, चिराग पासवान की पार्टी और कुछ क्षेत्रीय दल सक्रिय हैं।
42 पार्टियों के रजिस्ट्रेशन रद्द होने के बाद अब चुनावी समीकरण और ज्यादा साफ हो गया है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। आरजेडी ने कहा कि निष्क्रिय और फर्जी पार्टियों को हटाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। वहीं कांग्रेस ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे चुनाव पारदर्शी होंगे। हालांकि कुछ छोटे दलों ने इसे सियासी साजिश बताते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने बिना नोटिस दिए उनका पंजीकरण रद्द कर दिया।
मतदाताओं पर असर
बिहार के मतदाता अब ज्यादा स्पष्टता के साथ अपने विकल्पों को देख पाएंगे। छोटे दलों के हटने से भ्रम की स्थिति खत्म होगी और मुख्य दलों को सीधी चुनौती मिलेगी। इससे मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण भी बढ़ सकता है।
चुनाव आयोग का सख्त रुख
पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग निष्क्रिय पार्टियों पर लगातार निगरानी रख रहा है। आयोग का कहना है कि देशभर में हजारों पंजीकृत राजनीतिक दल हैं, जिनमें से कई केवल कागजों पर मौजूद हैं। ऐसे दल चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालते हैं और वित्तीय पारदर्शिता को नुकसान पहुंचाते हैं।
इस बार बिहार पर विशेष ध्यान इसलिए दिया गया है क्योंकि यहां विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और राज्य की राजनीति हमेशा राष्ट्रीय स्तर पर असर डालती है।
बिहार चुनाव 2025 से पहले 42 पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द होना एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। इससे चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी होगी और मतदाताओं को स्पष्ट विकल्प मिलेंगे। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति किस ओर करवट लेती है और कौन-सा गठबंधन इस चुनाव में जनता का भरोसा जीतने में सफल होता है।



