
भारत में दशहरा का पर्व बड़े ही उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रूप में जगह-जगह रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है। लेकिन इस पर्व से जुड़ा एक सवाल अक्सर लोगों के मन में उठता है कि क्या रावण को भगवान राम के हाथों मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त हुआ था या नहीं। पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं में इस सवाल के अलग-अलग उत्तर मिलते हैं।
क्या रावण को मोक्ष मिला था?
कई धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि रावण को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसका प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि उसका वध स्वयं भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम के हाथों हुआ। कुछ मान्यताओं के अनुसार, रावण यह जानता था कि भगवान के हाथों मृत्यु प्राप्त करने से ही उसे मोक्ष मिलेगा। इसी कारण उसने भगवान राम से शत्रुता मोल ली।
श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में यह भी उल्लेख है कि श्रीराम जैसे दीनबंधु और भक्तों के हितकारी ने रावण जैसे दुष्ट राक्षस को भी वही गति प्रदान की, जिसे महान ऋषि-मुनि भी कठिन साधनाओं के बाद पाते हैं। इससे संकेत मिलता है कि रावण को मोक्ष की प्राप्ति हो गई थी।

क्या रावण को मोक्ष नहीं मिला था?
कुछ विद्वान इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार रावण पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का द्वारपाल जय था। जय और विजय को श्राप मिला था कि उन्हें तीन बार राक्षस योनि में जन्म लेना होगा।
पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप बने।
दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण।
तीसरे जन्म में शिशुपाल और दंतवक्र।

इन तीनों ही जन्मों में उनका वध भगवान विष्णु के अवतारों ने किया। यदि रावण को दूसरे जन्म में ही मोक्ष मिल जाता तो उन्हें तीसरे जन्म की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। इस कथा के आधार पर माना जाता है कि रावण को तत्काल मोक्ष नहीं मिला था बल्कि जय-विजय को तीसरे जन्म के बाद ही अंतिम मुक्ति प्राप्त हुई।
रावण के मोक्ष को लेकर मान्यताओं में भिन्नता है। कुछ मानते हैं कि भगवान राम के हाथों वध के बाद उसे मोक्ष मिल गया, जबकि अन्य के अनुसार उसे अगले जन्म तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। यही कारण है कि दशहरा पर्व पर रावण के अंत और उसके मोक्ष की चर्चा हमेशा लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी रहती है।
इस लेख में दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं और लोक विश्वासों पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। पाठक इसे केवल आस्था और परंपरा के रूप में ही स्वीकार करें।

