पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर महागठबंधन (Mahagathbandhan) ने आखिरकार सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर सहमति बना ली है। लंबे मंथन और कई दौर की बैठकों के बाद कांग्रेस (Congress) को 60 सीटें मिलने का फैसला हुआ है। वहीं आरजेडी (RJD) सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर 120 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। सूत्रों के मुताबिक, वाम दलों को 23 सीटें और हम पार्टी को 5 सीटें दी जा सकती हैं। इस फॉर्मूले पर महागठबंधन की सभी सहयोगी पार्टियों ने सहमति जता दी है।
कांग्रेस को मिली 60 सीटें, फाइनल लिस्ट जल्द
जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस को जो 60 सीटें दी गई हैं, उनमें अधिकतर सीटें वे हैं जहां पिछले चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा था। पार्टी अपने पुराने गढ़ जैसे कि कटिहार, भागलपुर, सुपौल, अररिया, दरभंगा, सासाराम, और सीवान जैसे जिलों पर फोकस कर रही है।
कांग्रेस के बिहार प्रभारी ने बताया कि “हम सीट शेयरिंग फॉर्मूले से पूरी तरह संतुष्ट हैं। कांग्रेस इस बार बिहार में शानदार प्रदर्शन करेगी और महागठबंधन की सरकार दोबारा बनेगी।”
संभावित सीटों की लिस्ट (सूत्रों के मुताबिक)
कांग्रेस जिन प्रमुख सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, उनमें शामिल हैं —
कटिहार, भागलपुर, सुपौल, अररिया, किशनगंज, दरभंगा, सीतामढ़ी, मधुबनी, गया टाउन, नवादा, सासाराम, बक्सर, भोजपुर, जमुई, बांका, कैमूर, और मुजफ्फरपुर (टाउन सीट)।
हालांकि आधिकारिक लिस्ट अभी जारी नहीं की गई है, लेकिन पार्टी ने इन क्षेत्रों में अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया है। कई सीटों पर उम्मीदवारों के नाम लगभग तय हैं और जल्द आधिकारिक घोषणा की जाएगी।
RJD को 120 सीटें, वामदलों को 23 और HAM को 5
तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी (Rashtriya Janata Dal) को महागठबंधन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी मिली है। पार्टी 120 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। आरजेडी का फोकस मुख्य रूप से उत्तर बिहार और सीमांचल क्षेत्र पर रहेगा, जहां उसका पारंपरिक वोट बैंक मजबूत है।
वामदलों में CPI, CPM और CPI(ML) को कुल मिलाकर 23 सीटें दी गई हैं। वहीं जीतनराम मांझी की पार्टी HAM (Hindustani Awam Morcha) को 5 सीटें मिली हैं।
सीट शेयरिंग पर लंबी चली चर्चा
महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर पिछले कुछ हफ्तों से लगातार बैठकें चल रही थीं। पटना में हुई बैठक में कांग्रेस, आरजेडी, वाम दलों और हम पार्टी के नेताओं ने हिस्सा लिया। कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह और प्रभारी भक्त चरण दास मौजूद थे।
सूत्रों के अनुसार, शुरू में कांग्रेस 70 सीटों की मांग कर रही थी, लेकिन आरजेडी की आपत्ति के बाद समझौते के तहत 60 सीटों पर बात बनी।
2015 और 2020 के आंकड़ों से ली सीख
कांग्रेस ने 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों के नतीजों का विस्तृत विश्लेषण किया। 2020 में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से केवल 19 पर जीत मिली थी। वहीं 2015 में जेडीयू और आरजेडी के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं। इस बार पार्टी ने सीमित सीटों पर लड़ने और संगठन मजबूत करने की रणनीति बनाई है।
पार्टी का मानना है कि कम सीटों पर लड़कर भी यदि जीत का प्रतिशत बढ़ाया जाए, तो सरकार गठन में मजबूत भूमिका निभाई जा सकती है।
महागठबंधन का संदेश: एकता ही ताकत
तेजस्वी यादव ने बयान जारी कर कहा, “महागठबंधन बिहार की जनता की उम्मीदों का गठबंधन है। हम एकजुट होकर बिहार को नई दिशा देंगे।” कांग्रेस नेताओं ने भी कहा कि महागठबंधन का उद्देश्य किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि जनता का विकास है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि महागठबंधन अपने सहयोगियों के बीच तालमेल बना लेता है, तो NDA के लिए इस बार की लड़ाई कठिन हो सकती है।
NDA की तैयारी तेज
इधर बीजेपी और जेडीयू (JDU) ने भी अपने स्तर पर तैयारी तेज कर दी है। बीजेपी जल्द ही अपनी पहली उम्मीदवार सूची जारी कर सकती है। पार्टी का फोकस युवाओं, महिलाओं और पिछड़े वर्गों पर रहेगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस बार बिहार में मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है क्योंकि चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है।
कांग्रेस के अंदर टिकट बंटवारे पर मंथन
कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार चयन के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का गठन कर लिया है। इस कमेटी में वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ युवाओं को भी शामिल किया गया है। टिकट वितरण में स्थानीय लोकप्रियता, संगठनात्मक कार्य और सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता दी जाएगी।
कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि इस बार पार्टी नए चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में है, ताकि जनता को नया विकल्प दिया जा सके।
महागठबंधन के सीट शेयरिंग फॉर्मूले के बाद बिहार का चुनावी माहौल पूरी तरह गरम हो चुका है। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि कांग्रेस अपनी 60 सीटों पर किस तरह के उम्मीदवार उतारती है और क्या इस बार जनता का रुख महागठबंधन की ओर जाता है या NDA को फिर से मौका मिलता है।

