मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव आज बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे। वे NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के उम्मीदवारों के समर्थन में दो रैलियों को संबोधित करेंगे। यह कदम भाजपा और एनडीए की बिहार में चुनाव रणनीति को और मजबूत करने की दिशा में माना जा रहा है। प्रचार दल में लगभग 100 भाजपा नेता मध्य प्रदेश से बिहार भेजे गए हैं। इनमें मंत्री, संगठन प्रमुख और अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हैं।
प्रचार के स्वरूप और रणनीति
मोहन यादव की रैलियों का उद्देश्य आम जनता से संवाद करना, उनके समर्थन को जुटाना और स्थानीय मुद्दों पर एनडीए की तरफ से प्रतिबद्धताएँ देना है। भाजपा के लिए यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार चुनाव 2025 बेहद नजदीक है, और हर एक प्रचार अभियान वोटरों को प्रभावित कर सकता है।
मुश्किल स्थिति में प्रचार की अहम भूमिका
बिहार के 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव 6 और 11 नवंबर 2025 को होगा।
परिणाम 14 नवंबर को घोषित किया जाएगा।
इन रैलियों से भाजपा और NDA यह संदेश देना चाहेंगे कि भाजपा सिर्फ सत्ता में ही नहीं, बल्कि जनसमर्थन में भी सक्रिय है।
प्रचार का फोकस
स्थानीय विकास योजनाएं, केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएँ
अच्छे शासन का दावा
विपक्षी राजनीतिक दलों की नीतियों पर आलोचना
गठबंधन के भीतर एकता और रणनीतिक समन्वय
राजनीतिक परिदृश्य — संघर्ष और चुनौतियाँ
बिहार में इस चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल काफी गरम है। महागठबंधन दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर लगभग समझौता नहीं हो पाया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि बीजेपी एनडीए के भीतर सहयोगियों को कमजोर कर रही है।इसी बीच, SBSP (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) ने अपना पहला उम्मीदवार सूची जारी कर दी है और एनडीए से अलग रहने का निर्णय लिया है, जो गठबंधन को एक नई चुनौती दे सकता है।विपक्षी दलों ने भी मोर्चा संभाला है — तेजस्वी यादव ने राघोपुर से नामांकन दाखिल किया है, और विपक्ष इस चुनाव को ‘परिवर्तन’ का अवसर बता रहा है।
इन सबके बीच, भाजपा और NDA को यह दिखाना है कि उनकी संगठनात्मक एकता, प्रचार शक्ति और जनसमर्थन पर्याप्त है। मोहन यादव जैसे बाहरी मेहमान की रैलियाँ जनता को यह मैसेज देंगी कि भाजपा और NDA राज्यों की सीमाओं के पार साझा प्रतिबद्धता के साथ चुनाव लड़ रहे हैं।
प्रचार की चुनौतियाँ
1. स्थानीय मुद्दों का महत्व
बिहार के वोटर्स आम तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी संरचना, रोजगार जैसे स्थानीय मुद्दों पर अधिक ध्यान देते हैं। यदि प्रचार में ये बातें न हों, तो व्यापक समर्थन जुटाना कठिन होगा।
2. प्रतिद्वी गठबंधन की ताकत
RJD, कांग्रेस और अन्य दलों द्वारा मिलकर बनाए गए गठबंधन ‘महागठबंधन’ को अगर विपक्षी विजयी रणनीति बनाकर प्रचार करता है, तो भाजपा को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
3. स्रोत और संसाधन
प्रचार को सफल बनाने के लिए पर्याप्त वित्त, कार्यकर्ता, मीडिया कवरेज और लॉजिस्टिक (परिवहन, मंच आदि) का प्रबंधन आवश्यक होगा।
4. वोटर विश्वास एवं नेतृत्व व्यक्तित्व
मोदी, नितिश कुमार जैसे शीर्ष नेताओं का जनसंपर्क एवं भरोसा बहुत मायने रखता है। मोहन यादव को बिहार के वोटरों के बीच भरोसा स्थापित करना होगा कि वह यहां केवल मेहमान प्रचारक नहीं बल्कि समर्थक और रणनीतिक खिलाड़ी हैं।
संभावित प्रभाव
यदि रैलियाँ सफल रहीं, तो भाजपा और NDA को उत्तरप्रदेश, बंगाल आदि राज्यों से समर्थन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा ऐसी रैलियाँ स्थानीय उम्मीदवारों को उत्साह बढ़ाने और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में सहायक हो सकती हैं।
विपक्षी दल इस प्रचार पर तीखी प्रतिक्रिया देंगे — आलोचना, विरोध प्रदर्शन, मीडिया युद्ध आदि संभव हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का आज बिहार में प्रचार अभियान भाजपा–NDA की बिहार रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वे दो प्रमुख रैलियों को संबोधित करेंगे और जनसमर्थन जुटाने का प्रयास करेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिहाज़ से यह अभियान भाजपा के लिए न सिर्फ प्रचार गतिविधि बल्कि संदेश है — कि NDA के लिए बिहार कोई क्षेत्रीय राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी पूरक है।

