पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, सियासी हलचलें तेज होती जा रही हैं। इस बीच राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने बड़ा कदम उठाते हुए अपने 36 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं। इस फैसले से जहां पार्टी के भीतर हलचल मच गई है, वहीं एनडीए ने इसे परिवारवाद और मनमानी की राजनीति करार दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, आरजेडी ने जिन विधायकों के टिकट काटे हैं, उनमें कई पुराने और वरिष्ठ चेहरे भी शामिल हैं। पार्टी ने इस बार युवा और नए चेहरों को मौका देने की बात कही है। तेजस्वी यादव ने बैठक में साफ कहा कि अब जनता के बीच नई ऊर्जा और बेहतर छवि वाले उम्मीदवारों को उतारा जाएगा ताकि पार्टी का जनाधार मजबूत हो सके।
तेजस्वी यादव का बयान — “नए चेहरे जनता की उम्मीद बनेंगे”
तेजस्वी यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि,
“हमने जनता की नब्ज को समझते हुए टिकटों का बंटवारा किया है। आरजेडी में किसी के लिए स्थायी टिकट नहीं है। पार्टी प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लेती है। जनता के बीच जिन विधायकों की छवि खराब थी, उन्हें हटाना जरूरी था।”
उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला संगठन की मजबूती और जनता के विश्वास को ध्यान में रखकर लिया गया है। आरजेडी ने इस बार टिकट वितरण में सामाजिक संतुलन और जातीय समीकरण का भी ध्यान रखा है।
एनडीए का पलटवार — ‘परिवारवाद और आंतरिक कलह की झलक’
आरजेडी के इस कदम पर एनडीए ने तीखा हमला बोला है। बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा कि,
“आरजेडी में टिकट कटने की असली वजह जनता नहीं, बल्कि परिवार के भीतर की खींचतान है। तेजस्वी यादव अपने विरोधी गुटों को किनारे कर रहे हैं। पार्टी में लोकतंत्र की जगह परिवारवाद का शासन है।”
जेडीयू के नेताओं ने भी इसे ‘आंतरिक असंतुलन’ और ‘भ्रष्टाचार के डर’ से जोड़ा है। उनका कहना है कि कई विधायकों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और आरजेडी ने चुनावी छवि सुधारने के लिए यह कदम उठाया, लेकिन असल मकसद गुटबाजी को खत्म करना है।
टिकट कटने से नाराज विधायकों की नाराजगी खुलकर सामने आई
आरजेडी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, टिकट से वंचित कुछ विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी जताई है। कई नेताओं ने मीडिया से कहा कि वे वर्षों से पार्टी के प्रति निष्ठावान रहे हैं, लेकिन अचानक टिकट काटना “अन्याय” है। कुछ नेताओं ने निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ने की चेतावनी भी दी है। पटना, गया, मधुबनी, समस्तीपुर और सीवान जैसे जिलों में टिकट से वंचित नेताओं के समर्थकों ने पार्टी दफ्तरों के बाहर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने ‘पुराने नेताओं के साथ अन्याय बंद करो’ जैसे नारे लगाए।
राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आरजेडी का यह कदम रणनीतिक है। पार्टी युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश में है और पुराने चेहरों की जगह युवाओं को उतारकर “परिवर्तन” का संदेश देना चाहती है। हालांकि, यह फैसला उल्टा भी पड़ सकता है यदि असंतुष्ट नेता बागी बनकर मैदान में उतरते हैं।
पटना यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार कहते हैं,
“तेजस्वी यादव अपनी छवि को ‘भ्रष्टाचार से मुक्त नई राजनीति’ के रूप में पेश करना चाहते हैं। टिकट काटना उसी प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन इससे आंतरिक कलह भी बढ़ सकती है।”
एनडीए को मिल सकता है लाभ
विशेषज्ञों का कहना है कि आरजेडी के अंदर मचे असंतोष का सीधा फायदा एनडीए को मिल सकता है। बीजेपी और जेडीयू इस असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति बना रही हैं। कई नाराज आरजेडी नेता पहले से ही एनडीए से संपर्क में बताए जा रहे हैं।
एनडीए के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि,
“तेजस्वी यादव के इस फैसले से कई अनुभवी विधायक अब हमारे साथ आ सकते हैं। जनता को अब समझ आ रहा है कि आरजेडी में सिर्फ एक परिवार की चलती है, लोकतंत्र नहीं।”
आरजेडी का जवाब — “यह सफाई की प्रक्रिया है”
आरजेडी प्रवक्ता शक्ति यादव ने कहा कि यह कदम किसी के खिलाफ नहीं बल्कि पार्टी के भविष्य के लिए उठाया गया है।
“हमने उन विधायकों को ही टिकट से बाहर किया है जिनकी रिपोर्ट जनता और स्थानीय कार्यकर्ताओं से नकारात्मक थी। यह सफाई की प्रक्रिया है ताकि जनता को बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।”
उन्होंने कहा कि पार्टी अब विकास, शिक्षा, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर जनता के बीच जाएगी।
2025 चुनाव से पहले बढ़ी सियासी गरमी
बिहार चुनाव 2025 के लिए अब सभी दलों ने अपनी-अपनी रणनीति तेज कर दी है। जहां आरजेडी उम्मीदवारों में बड़े बदलाव कर रही है, वहीं एनडीए विकास और सुशासन के मुद्दे पर वोट मांगने की तैयारी में है।
पिछले चुनाव में आरजेडी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, लेकिन इस बार टिकट वितरण को लेकर आंतरिक असंतोष पार्टी की राह मुश्किल बना सकता है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में बिहार की सियासत में और भी कई अप्रत्याशित मोड़ देखने को मिल सकते हैं।

