छठ पूजा भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र त्योहारों में से एक है, जो सूर्यदेव और उनकी पत्नी ऊषा एवं प्रत्यूषा को समर्पित है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। छठ पर्व की विशेषता यह है कि इसमें डूबते और उगते सूर्य दोनों को अर्घ्य दिया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर छठ पूजा में डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा क्यों है? आइए जानते हैं इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक कारण।
डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का धार्मिक कारण:
छठ पूजा का तीसरा दिन, जिसे “संध्या अर्घ्य” कहा जाता है, विशेष महत्व रखता है। इस दिन श्रद्धालु महिलाएं नदी, तालाब या किसी जलाशय में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, डूबते सूर्य को अर्घ्य देना कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक है। यह उस सूर्य की पूजा है जिसने दिनभर पृथ्वी को प्रकाश और ऊर्जा दी।
सूर्य देव की पत्नी देवी प्रत्यूषा की आराधना भी इसी समय की जाती है। देवी प्रत्यूषा को सांध्यकाल की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। माना जाता है कि संध्या समय उनकी उपासना करने से व्यक्ति के जीवन में चल रही कठिनाइयों और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और जीवन में नई रोशनी का संचार होता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से छठ पूजा का महत्व:
छठ पूजा को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। डूबते सूर्य की किरणें शरीर को शांत करने और ऊर्जा संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। सूर्य की किरणें हमारे शरीर में विटामिन D का संचार करती हैं, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा, जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर का संतुलन, रक्त प्रवाह और मानसिक स्थिरता में सुधार होता है।
उगते सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व:
छठ पूजा का चौथा दिन “उषा अर्घ्य” कहलाता है, जो उगते सूर्य को समर्पित होता है। यह नया आरंभ, सकारात्मकता और जीवन में नई ऊर्जा का प्रतीक है। जहां डूबते सूर्य को अर्घ्य देना कृतज्ञता और समाप्ति का संकेत है, वहीं उगते सूर्य को अर्घ्य देना नई शुरुआत और उम्मीद का प्रतीक माना गया है।
छठ पूजा की विशेषता:
छठ व्रत में व्रती निर्जला उपवास रखकर सूर्य देव की पूजा करते हैं। यह व्रत आत्म-शुद्धि, संयम और आस्था का प्रतीक है। छठ पर्व का हर चरण – नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य – जीवन के चार प्रमुख पहलुओं का प्रतीक माना जाता है: शुद्धता, भक्ति, कृतज्ञता और नवप्रेरणा।
आस्था और श्रद्धा का पर्व:
छठ पूजा न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के गहरे संबंध का प्रतीक भी है। इस दिन सूर्य की उपासना के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता को आमंत्रित करता है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा यह सिखाती है कि हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत है और अंधकार के बाद प्रकाश का उदय अवश्य होता है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। इसमें बताए गए विचार आस्था और विश्वास से जुड़े हैं। पाठकों से निवेदन है कि इसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें।

