दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए की गई क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) की कोशिश अब सवालों के घेरे में आ गई है। दोपहर में हुए ट्रायल के बाद भी राजधानी में बारिश नहीं हुई, जिससे दिल्ली सरकार की इस पहल पर विपक्ष ने निशाना साधा है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने इसे “आर्टिफिशियल रेन के नाम पर फर्जीवाड़ा” बताते हुए कहा है कि यह जनता को दिखाने के लिए किया गया दिखावा है।
क्या है क्लाउड सीडिंग का ट्रायल?
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के बढ़ते स्तर को कम करने के लिए मंगलवार को राजधानी में क्लाउड सीडिंग तकनीक का प्रयोग किया। इस प्रक्रिया में विमान के जरिए हवा में कुछ विशेष रसायनों (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड आदि) का छिड़काव किया जाता है, जिससे बादलों में कृत्रिम रूप से बारिश उत्पन्न की जा सके।
इस बार दिल्ली के कई इलाकों — जैसे रोहिणी, द्वारका, करोल बाग, और साकेत — में यह ट्रायल किया गया। दावा था कि ट्रायल के 30 से 40 मिनट के भीतर बारिश शुरू हो जाएगी, लेकिन दो घंटे बीत जाने के बाद भी आसमान से एक बूंद पानी नहीं गिरा।
प्रदूषण पर अंकुश की उम्मीदों पर पानी फिरा
दिल्ली में इन दिनों प्रदूषण का स्तर खतरनाक श्रेणी में है। AQI कई इलाकों में 400 के पार पहुंच चुका है। ऐसे में सरकार को उम्मीद थी कि कृत्रिम बारिश से हवा में फैले प्रदूषक कण (PM 2.5 और PM 10) धुल जाएंगे।
लेकिन ट्रायल असफल रहने से यह प्रयोग अब चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग तभी सफल होती है जब वातावरण में पर्याप्त बादल मौजूद हों, जबकि आज का मौसम सूखा और शुष्क था।
AAP ने किया हमला, कहा “यह सिर्फ दिखावा है”
AAP के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने दिल्ली सरकार पर हमला बोलते हुए कहा,
“यह पूरा प्रयोग जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए किया गया। बादलों की स्थिति का आकलन किए बिना करोड़ों रुपये इस फर्जी ट्रायल पर खर्च कर दिए गए।”
उन्होंने कहा कि सरकार को पहले मौसम विभाग और IIT कानपुर जैसे वैज्ञानिक संस्थानों से परामर्श लेना चाहिए था।
AAP ने सवाल उठाया कि अगर क्लाउड सीडिंग सफल नहीं हुई तो इसका खर्च कौन वहन करेगा? क्या यह केवल “प्रदूषण पर नियंत्रण” का राजनीतिक स्टंट था?
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग एक जटिल प्रक्रिया है और इसकी सफलता पूरी तरह से बादलों की नमी, तापमान और हवा की दिशा पर निर्भर करती है।
भारत में इससे पहले भी महाराष्ट्र, कर्नाटक और राजस्थान जैसे राज्यों में क्लाउड सीडिंग के ट्रायल किए गए थे, जिनमें से कई असफल रहे थे।
आईआईटी कानपुर के एक विशेषज्ञ ने बताया कि —
“अगर वातावरण में पर्याप्त आर्द्रता नहीं है तो क्लाउड सीडिंग के बाद भी बारिश नहीं होती। दिल्ली का वातावरण फिलहाल सूखा है, इसलिए परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आए।”
कितना खर्च हुआ ट्रायल पर?
रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली सरकार ने इस ट्रायल पर करीब 1.2 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसमें विमान किराए, केमिकल्स, तकनीकी सहायता और मौसम विश्लेषण की लागत शामिल है।
विपक्षी दलों ने इसे जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी बताया है और ट्रायल की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
सरकार की सफाई
वहीं दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह केवल पहला ट्रायल था। उन्होंने बताया —
“क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है और इसके लिए कई बार परीक्षण करने पड़ते हैं। एक असफल प्रयास का मतलब यह नहीं कि तकनीक काम नहीं करती। अगले कुछ दिनों में हम दोबारा ट्रायल करेंगे।”
सरकार का दावा है कि प्रदूषण कम करने के लिए हर संभव वैज्ञानिक उपाय अपनाए जाएंगे, चाहे वह कृत्रिम बारिश हो या वायु शुद्धिकरण मशीनें।
दिल्लीवालों की प्रतिक्रिया
दिल्ली के कई नागरिकों ने सोशल मीडिया पर इस ट्रायल को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ लोगों ने इसे ‘आशा की किरण’ बताया, तो कुछ ने इसे “सरकारी नौटंकी” कहकर ट्रोल किया।
एक यूजर ने लिखा —
“बारिश नहीं हुई, लेकिन ट्रायल का वीडियो जरूर वायरल हो गया!”
दूसरे ने कहा —
“दिल्ली में क्लाउड सीडिंग नहीं, ‘क्लाउड फीडिंग’ हो रही है… पैसे बादलों में उड़ गए।”
विश्लेषण: क्या वाकई समाधान है क्लाउड सीडिंग?
विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग सिर्फ अस्थायी राहत देती है, स्थायी समाधान नहीं। प्रदूषण से निपटने के लिए सबसे ज़रूरी है —
वाहनों से उत्सर्जन कम करना,
औद्योगिक धुएं पर नियंत्रण,
निर्माण कार्यों में धूल नियंत्रण उपाय,
और हरे-भरे क्षेत्रों को बढ़ाना।
कृत्रिम बारिश केवल कुछ घंटों के लिए हवा को साफ कर सकती है, लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान नहीं है।
दिल्ली में प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए की गई क्लाउड सीडिंग का पहला प्रयास नाकाम रहा। अब देखना यह होगा कि क्या अगले ट्रायल में सरकार कुछ ठोस परिणाम दिखा पाएगी या फिर यह प्रयोग भी केवल एक “राजनीतिक बारिश” बनकर रह जाएगा।
फिलहाल, विपक्ष ने इस मुद्दे को बड़ा हथियार बना लिया है और आने वाले दिनों में यह दिल्ली की सियासत में नया तूफान ला सकता है।

