अक्षय नवमी के पावन अवसर पर जिलेभर के मंदिरों और आंवला वृक्षों के नीचे सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। महिलाएं व्रत रखकर मां जगद्धात्री की पूजा-अर्चना में लीन रहीं। श्रद्धालु परिवार सहित आंवला वृक्ष के नीचे बैठकर विधिवत पूजा, कथा श्रवण और ब्राह्मण भोजन का आयोजन करते नजर आए।
धार्मिक आस्था के अनुसार, अक्षय नवमी का दिन मां जगद्धात्री देवी को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा करने से देवी मां प्रसन्न होकर अपने भक्तों को अक्षय पुण्य और मनवांछित फल प्रदान करती हैं।
आंवला वृक्ष की पूजा का महत्व:
स्थानिय संत झलक महाराज के अनुसार, अक्षय नवमी के दिन आंवला वृक्ष की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। यह दिन धन, सुख, समृद्धि और आरोग्यता की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने बताया कि आंवला वृक्ष में स्वयं मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का वास माना गया है। जो भी भक्त श्रद्धा से इस दिन पूजा करते हैं, उन्हें कभी दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता।
महाराज ने कहा —
“आज के दिन आंवला वृक्ष के नीचे जगद्धात्री माता की पूजा करने से मां प्रसन्न होती हैं और भक्त को जीवन में हर प्रकार की सफलता मिलती है। इस वृक्ष की छांव में किया गया ब्राह्मण भोजन और कथा श्रवण अक्षय पुण्य देता है।”
पौराणिक मान्यता और कथा:
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अक्षय नवमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया था। वहीं से उनके पृथ्वी लोक के कार्यों की नई शुरुआत मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के पूजन के साथ-साथ आंवला वृक्ष की आराधना करने से जीवन में आने वाले समस्त दोष दूर होते हैं और सुख-शांति बनी रहती है।
आंवला वृक्ष का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में किया गया है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में बताया गया है कि आंवला वृक्ष की पूजा से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और यह सभी पापों को नष्ट करता है।
आयुर्वेद में आंवला का महत्व:
आंवला केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें विटामिन-सी, कैल्शियम, और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित रूप से आंवला का सेवन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, त्वचा में निखार आता है, और बालों की मजबूती बनी रहती है।
आंवला को “रसायन औषधि” कहा गया है — यानी वह तत्व जो शरीर को अंदर से सशक्त बनाता है और दीर्घायु प्रदान करता है। इसलिए अक्षय नवमी का यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य जागरूकता का प्रतीक भी बन गया है।
पूजा विधि और श्रद्धालुओं की आस्था:
भोर से ही श्रद्धालु आंवला वृक्ष के नीचे पहुंचकर जल, दूध, फूल, दीपक, और नैवेद्य अर्पित करते दिखे। महिलाएं पारंपरिक परिधान में सज-धजकर पूजा कर रही थीं और माता जगद्धात्री से परिवार की सुख-शांति की कामना कर रही थीं।
पूजा के बाद श्रद्धालुओं ने ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दी और स्वयं प्रसाद ग्रहण किया। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन और जगद्धात्री कथा का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं और बच्चों की बड़ी भागीदारी रही।
सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू:
इस पर्व ने लोगों के बीच सामाजिक समरसता का भी संदेश दिया। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से वृक्ष की रक्षा का संकल्प लिया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
स्थानीय युवाओं ने बताया कि ऐसे धार्मिक अवसरों से न केवल आस्था जागती है बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती है।
झलक महाराज का संदेश:
महाराज झलक ने श्रद्धालुओं से अपील की कि
“आंवला वृक्ष केवल पूजा के दिन नहीं, बल्कि पूरे वर्ष पर्यावरण संतुलन के लिए पूजनीय है। हमें इस वृक्ष की रक्षा करनी चाहिए ताकि जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहे।”
अक्षय नवमी का यह पर्व श्रद्धा, भक्ति और अध्यात्म का संगम है। आंवला वृक्ष की पूजा-अर्चना के साथ मां जगद्धात्री की आराधना से भक्तों ने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
यह पर्व हमें बताता है कि आस्था और प्रकृति दोनों का सम्मान ही सच्चे धर्म का प्रतीक है।

