जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने बिहार चुनाव में करारी हार के बाद मीडिया के सामने पहली बार खुलकर बात की। हार की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पुराने बयान—”राजनीति में असफल होने पर संन्यास ले लेने”—पर भी विस्तार से स्पष्टीकरण दिया। लेकिन क्या वे सच में राजनीति छोड़ने जा रहे हैं? क्या जन सुराज को आगे रोक दिया जाएगा? या फिर बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका अब एक नए मोड़ पर है? इन सभी सवालों के जवाब खुद प्रशांत किशोर ने अपने हालिया बयान में दिए।

सोमवार को पटना में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर ने साफ कहा कि वे चुनाव परिणामों से निराश नहीं हैं, लेकिन जनता का जनादेश सर्वोपरि है। “मैं हार की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं। यह सच है कि हम उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। लेकिन यह भी सच है कि हमारी यात्रा खत्म नहीं हुई है,” उन्होंने कहा।
क्या प्रशांत किशोर सच में राजनीति छोड़ देंगे?
बिहार में अपना राजनीतिक प्रयोग शुरू करते समय प्रशांत किशोर ने कहा था कि वे पाँच साल के भीतर जनता से समर्थन नहीं पा सके तो राजनीति छोड़ देंगे। इस बयान को चुनाव नतीजों के बाद लगातार उठाया जा रहा था। इस पर उन्होंने दो टूक जवाब दिया:
“मैं अपने बयान पर आज भी कायम हूं। मैंने कहा था कि अगर मेरा प्रयास फेल हुआ तो मैं राजनीति में पद पाने की कोशिश नहीं करूंगा। लेकिन जनता की सेवा करना संन्यास नहीं है। मैं बिहार छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि संन्यास का अर्थ राजनीतिक पदों, चुनावी दौड़ या सत्ता की राजनीति से दूर रहना है, न कि जन आंदोलन या सामाजिक कार्यों से। उन्होंने कहा कि जन सुराज का उद्देश्य राजनीति का विकल्प पैदा करना है और वह मिशन हार के साथ खत्म नहीं होगा।
“जन सुराज बंद नहीं होगा, बल्कि और मजबूत होगा”
चुनाव नतीजों के बावजूद प्रशांत किशोर ने संकेत दिया कि जन सुराज अभियान को वह खत्म नहीं करेंगे। उन्होंने कहा:
“हमारे पास अभी लंबी यात्रा बाकी है। जन सुराज आंदोलन बिहार में जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाएगा—चाहे हम विधानसभा में हों या सड़क पर। हमारा संघर्ष जारी रहेगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव सिर्फ एक माध्यम था, उद्देश्य नहीं। उनका असली लक्ष्य बिहार की प्रशासनिक और सामाजिक समस्याओं के स्थायी समाधान को लेकर जनमत बनाना है।
PK की नई शर्तें – किस आधार पर तय होगा राजनीतिक भविष्य?
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की सबसे अहम बात यह रही कि प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए नई शर्तें रखीं। उन्होंने कहा कि:
1. अगर बिहार में उनके आंदोलन के प्रति जनसमर्थन बढ़ता है तो ही वे दोबारा चुनावी राजनीति में सक्रिय होंगे।
2. जनता का विश्वास दोबारा नहीं मिला तो वे फिर कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे।
3. कोई पद या गठबंधन करने की राजनीति नहीं करेंगे।
4. जन सुराज का हर निर्णय जनता की सहभागिता और पारदर्शिता के आधार पर होगा।
इस बयान के बाद माना जा रहा है कि वे फिलहाल औपचारिक राजनीति से दूरी बनाकर संगठन और सामाजिक अभियानों पर ज्यादा ध्यान देंगे।
बिहार में ही रहेंगे PK – रणनीति बदलने का संकेत
प्रशांत किशोर ने यह भी साफ किया कि वे दिल्ली या दूसरे राज्यों की राजनीति में वापसी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा:
“मैं बिहार में ही रहूंगा। यहां की समस्याओं को समझने और समाधान तैयार करने में ही मेरा समय लगेगा। मेरा संघर्ष बिहार की जनता के साथ है।”
इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि PK अपने मॉडल को राजनीति से ज्यादा सामाजिक सुधारों के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
चुनावी हार के कारणों पर PK का आत्ममंथन
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने चुनावी हार के संभावित कारणों का भी जिक्र किया। उनके अनुसार:
जन सुराज संगठन अभी पूरी तरह ग्रामीण इलाकों में नहीं फैल पाया।
सीमित संसाधनों और समय के कारण बड़े दलों की तुलना में अभियान कमजोर रहा।
कई क्षेत्रों में संगठनात्मक ढांचा मजबूत नहीं बन सका।
नई पार्टी होने के कारण जनता के बीच भरोसा बनाने में समय लग रहा है।
PK ने कहा कि वे इन कमियों को स्वीकार करते हैं और आने वाले महीनों में संगठन को मजबूत करने के लिए नए प्लान की घोषणा करेंगे।
क्या PK फिर से चुनाव लड़ेंगे?
इस सवाल पर वे ज्यादा स्पष्ट नहीं हुए लेकिन इतना जरूर कहा:
“चुनाव लड़ना या न लड़ना जनता के मूड पर निर्भर करेगा। अगर जनता कहेगी कि मुझे चुनाव लड़ना चाहिए, तभी मैं सोचूंगा।”
इस बयान को राजनीतिक संकेत माना जा रहा है कि उन्होंने पूरी तरह राजनीति से दूरी की घोषणा नहीं की है, बल्कि भविष्य के लिए विकल्प खुला रखा है।
बिहार की राजनीति पर असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि PK का यह बयान बिहार की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है।
यदि वे राजनीति में सक्रिय रहते हैं तो विपक्ष और सत्ताधारी गठबंधन—दोनों के लिए चुनौती साबित हो सकते हैं।
अगर वे आंदोलनकारियों की तरह जनता के मुद्दों पर सड़क पर उतरते हैं, तो वह भी सरकार के लिए दबाव का कारण बनेगा।
जन सुराज के कार्यकर्ता पहले से ही गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं, जिन्हें अब और गति मिलने की संभावना है।
आगे क्या?
प्रशांत किशोर ने घोषणा की कि दिसंबर से वे बिहार के 20 जिलों की नई जन संवाद यात्रा शुरू करेंगे। इस यात्रा का उद्देश्य लोगों की शिकायतों को सीधे सुनना और जन सुराज के अगले चरण की रणनीति तय करना होगा।
उन्होंने कहा:
“नीति, नीयत और दिशा—ये तीन बातें नहीं बदलेंगी। मैं राजनीति से हट सकता हूं, लेकिन बिहार की लड़ाई से नहीं।”

