देवघर। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जसीडीह में मलेरिया सुपरवाइजर के पद पर अनुबंध के आधार पर कार्यरत राजीव रंजन की मौत ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। हृदय गति रुकने से हुई उनकी मौत को परिजनों और स्वास्थ्यकर्मियों ने विभागीय प्रताड़ना और अत्यधिक कार्य दबाव का परिणाम बताया है। मौत के बाद स्वास्थ्यकर्मियों में गहरा रोष है और जिला प्रशासन से दोषी अधिकारियों पर सख़्त कार्रवाई की मांग उठ रही है।

रास्ते में बिगड़ी तबीयत, सदर अस्पताल में मौत
जानकारी के अनुसार, राजीव रंजन को 10 दिसंबर को रांची में आयोजित प्रशिक्षण में शामिल होने जाना था। वे प्रशिक्षण के लिए रवाना हुए ही थे कि रास्ते में अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। आनन-फानन में उन्हें वापस देवघर सदर अस्पताल लाया गया, जहां हृदय गति रुक जाने से उनकी मौत हो गई। अस्पताल परिसर में पदाधिकारियों और कर्मचारियों ने श्रद्धांजलि देकर दो मिनट का मौन रखा और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
बीमारी से जूझ रहे थे, हाल ही में हुआ था ऑपरेशन
राजीव रंजन पहले से हृदय रोग से पीड़ित थे। कुछ दिनों पूर्व उनका ऑपरेशन भी हुआ था। करीब पंद्रह दिन पहले ही वह भैलोर से इलाज कराकर लौटे थे। बीमारी के कारण उन्होंने कई बार विभाग से आग्रह किया था कि उन्हें जसीडीह में ही कार्य करने दिया जाए ताकि इलाज और दिनचर्या सुचारू रहे।
लेकिन उनकी बीमारी और चिकित्सा प्रमाणपत्रों के बावजूद विभागीय स्तर पर उन्हें लगातार जसीडीह और देवीपुर—दोनों जगह काम करने का दबाव बनाया जा रहा था। कुछ महीने पहले उन्हें जसीडीह से हटाकर देवीपुर भेजा गया, जिसका उन्होंने बीमारी के आधार पर विरोध किया था। परन्तु इसके बावजूद जिला मलेरिया पदाधिकारी ने देवीपुर में अनुपस्थित दिखाते हुए उनके मानदेय भुगतान पर भी आपत्ति दर्ज कर दी।
फिटनेस जांच के नाम पर ‘प्रताड़ना’, सेवा समाप्ति की आशंका से डरे थे
परिजनों व सहकर्मियों का कहना है कि बीमारी का प्रमाण देने के बावजूद विभाग ने फिटनेस जांच कराकर उन पर दबाव बढ़ाया। जब उन्होंने भैलोर अस्पताल के मेडिकल दस्तावेज प्रस्तुत किए, तब भी उन्हें प्रशिक्षण कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल होने का आदेश दिया गया।
सहकर्मियों का आरोप है कि फिटनेस जांच और लगातार ट्रांसफर के आदेश, उन्हें प्रताड़ित कर सेवा खत्म करने की साजिश थी। बीमारी के बावजूद नौकरी जाने के भय से राजीव रंजन प्रतिरोध नहीं कर पाए और विभागीय आदेशों का पालन करते रहे।
सिविल सर्जन को भी दी थी शिकायत, फिर भी नहीं मिला उचित राहत
राजीव रंजन ने 17 नवंबर 2025 को सिविल सर्जन देवघर को पत्र लिखकर अपनी बीमारी, कार्यस्थल के दबाव और परेशानियों की जानकारी दी थी। इस शिकायत के आधार पर सिविल सर्जन की ओर से 28 नवंबर को आदेश भी जारी किया गया।
लेकिन इस आदेश के बावजूद विभागीय अधिकारियों ने 10 दिसंबर को होने वाले रांची प्रशिक्षण में उनकी अनिवार्य उपस्थिति तय की। सवाल यह है कि जब विभाग को उनकी गंभीर बीमारी और हालिया ऑपरेशन की जानकारी थी, तब भी उन्हें लंबी यात्रा के लिए क्यों मजबूर किया गया?
‘यह मौत नहीं… विभागीय हत्या है’—कर्मचारी संघ का आरोप
झारखंड चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष मनोज कुमार मिश्र ने स्पष्ट रूप से कहा कि—
“राजीव रंजन ईमानदार कर्मचारी थे। बीमारी के बावजूद वह नौकरी बचाने के लिए विभागीय आदेश मानने को मजबूर थे। यह सिर्फ मौत नहीं, बल्कि विभागीय प्रताड़ना से हुई हत्या है। जिन अधिकारियों ने उन पर अनावश्यक दबाव बनाया, उन पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि अगर जिला प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई नहीं करता, तो कर्मचारी संगठन बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होगा।
परिजनों और कर्मचारियों में नाराजगी, मुआवजा और नौकरी की मांग
पोस्टमार्टम के बाद शव को परिजनों को सौंपा गया, जिसके बाद जसीडीह के सिंह जोरी गांव में अंतिम संस्कार किया गया। गांव में शोक का माहौल है और परिजनों में गहरा आक्रोश है।
कर्मचारी संघ ने मांग की है कि—
राजीव रंजन की मौत के जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों पर तत्काल FIR दर्ज की जाए,
परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाए,
मृतक की पत्नी को MTS के खाली पद पर नियुक्त किया जाए,
संपूर्ण मामले की उच्च स्तरीय जांच हो।
क्यों उठ रहे हैं सवाल?
यह मामला कई गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—
क्या बीमारी से जूझ रहे कर्मचारी पर लगातार अत्यधिक कार्य दबाव डालना उचित था?
जब मेडिकल डॉक्यूमेंट उपलब्ध थे, तो फिटनेस जांच और प्रशिक्षण में अनिवार्य उपस्थिति की मजबूरी क्यों?
क्या यह विभागीय प्रताड़ना की श्रेणी में आता है?
क्या स्वास्थ्य विभाग अपने अनुबंध कर्मियों के स्वास्थ्य, मानवीय संवेदनाओं और अधिकारों को लेकर लापरवाह है?
इन सवालों ने देवघर के स्वास्थ्य विभाग के कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
कर्मचारियों में भारी आक्रोश, जांच की मांग
सदर अस्पताल और जसीडीह स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों में भी इस घटना के बाद आक्रोश है। उनका कहना है कि विभागीय अधिकारी अक्सर अनुबंध कर्मियों पर अनावश्यक दबाव डालते हैं, जिससे कई लोग मानसिक और शारीरिक रूप से टूटने लगते हैं।
यह मौत पूरे सिस्टम के लिए एक चेतावनी है कि अनुबंध कर्मियों की सुरक्षा, कार्यस्थिति और सम्मान को लेकर गंभीर सुधार की आवश्यकता है।
जिला प्रशासन की भूमिका पर भी निगाह
अब नजर जिला प्रशासन पर है कि वह इस गंभीर घटना को कितनी गंभीरता से लेता है। कर्मचारी संगठन और परिजन यह उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन त्वरित निर्णय लेते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगा।
अगर ऐसा नहीं होता, तो यह मामला एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
