उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के सुल्तानपुर पट्टी (जिसका नया नाम कौशल्यापुरी) स्थित एक प्राइवेट स्कूल में सुबह की प्रार्थना के दौरान छात्रों को ‘कलमा’ पढ़ाया गया, जिसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह मामला तब और अधिक गर्मा गया जब स्थानीय हिंदू संगठनों ने स्कूल परिसर में पहुंचकर विरोध जताया और प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग की। इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा, धर्म तथा सांस्कृतिक संवेदनाओं को लेकर एक नया बहस-सत्र शुरू कर दिया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में स्कूली बच्चों को अरबी शब्दों का उच्चारण करते हुए देखा गया, जिससे यह प्रतीत होता है कि सुबह के कार्यक्रम में उन्हें कलमा पढ़ाया जा रहा था। वीडियो के वायरल होते ही स्थानीय हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता, अभिभावक तथा नागरिक इस कृत्य को अनुपयुक्त और सांस्कृतिक अनुचित बताते हुए स्कूल के बाहर जमकर विरोध करने लगे।
हिंदू संगठनों के प्रतिनिधियों ने स्कूल प्रशासन तथा वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर ज्ञापन सौंपा और मांग की कि इस प्रकार की गतिविधियाँ बंद की जाएं और इस मामले में संबंधित अधिकारियों तथा शिक्षकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
पृष्ठभूमि और स्थानीय प्रतिक्रिया
स्कूल के प्रांगण में जब यह विवाद शुरू हुआ, तो स्थानीय हिंदू संगठनों ने यह आरोप लगाया कि छोटे-छोटे हिंदू छात्रों को भी इस धार्मिक पाठ में शामिल किया जा रहा था, जो उनकी धार्मिक आज़ादी और संवेदनाओं का उल्लंघन है। अभिभावकों का कहना था कि स्कूल में बच्चों के बीच धार्मिक गतिविधियों को ऐसे तरीके से शामिल नहीं किया जाना चाहिए जिससे किसी समुदाय की भावनाएँ आहत हों।
हिंदू संगठनों के एक प्रतिनिधि ने कहा, “यह एक ऐसा मामला है जहां हमारे सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों का सम्मान नहीं किया गया। बच्चों को उस धर्म के पाठ में शामिल करना, जिससे वे संबंधित नहीं हैं, अनुचित है। हम चाहते हैं कि शिक्षा विभाग इस मामले की गंभीरता से जांच करे और ऐसे कृत्यों पर रोक लगाए।”
वहीं, कई स्थानीय अभिभावकों ने यह भी कहा कि शिक्षा और धार्मिक शिक्षा के बीच फर्क होना चाहिए, और स्कूलों को किसी भी विश्वास-आधारित पाठ को अनिवार्य रूप से लागू नहीं करना चाहिए।
स्कूल व्यवस्थापन की प्रतिक्रिया
वीडियो वायरल होने के बाद जब मीडिया टीम ने स्कूल प्रशासन से प्रतिक्रिया मांगी, तो प्रधानाचार्य ने कहा कि यह प्रणाली पिछले कुछ समय से सुबह के प्रार्थना सत्र का हिस्सा थी और इसका उद्देश्य सभी छात्रों के बीच सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देना था। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस निर्णय से कुछ अभिभावकों और संगठनों में असंतोष उत्पन्न हुआ, इसलिए यह अभ्यास तुरंत रोक दिया गया है।
विद्यालय के प्रिंसिपल का कहना था कि उनका इरादा किसी भी छात्र के धार्मिक विश्वास को प्रभावित करने का नहीं था, बल्कि सभी समुदायों के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना था। उन्होंने यह भी कहा कि आगे से सुबह प्रार्थना सत्र को लेकर सभी अभिभावकों की सहमति और सुझाव लिया जाएगा।
शिक्षा विभाग और प्रशासन की स्थिति
इस मामले को लेकर शिक्षा विभाग ने संज्ञान ले लिया है और स्कूल के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने बताया कि स्कूल प्रशासन को नोटिस जारी किया गया है और शिक्षा नीति के उल्लंघन की जांच की जा रही है। यदि जांच में पाया गया कि स्कूल ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो विभाग उचित कार्रवाई करेगा।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हम इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। शिक्षा संस्थानों में धार्मिक गतिविधियों को लागू करते समय छात्रों और उनके परिवारों की भावनाओं और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान बहुत आवश्यक है। किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी।”
कानूनी और सामाजिक पहलू
इस घटना ने एक बार फिर भारत में धर्म, शिक्षा और सांस्कृतिक संवेदनाओं के बीच संतुलन जैसे संवेदनशील विषयों को उजागर किया है। भारत एक धार्मिक रूप से विविध और संवेदनशील लोकतंत्र है, जहां संविधान हर नागरिक को धर्म की आज़ादी प्रदान करता है। हालांकि, शिक्षा संस्थानों में किसी विशेष धार्मिक पाठ को अनिवार्य करना, विशेषकर जब छात्रों की व्यक्तिगत उपस्थिति या भागीदारी बिना स्पष्ट सहमति के हो, यह विवादास्पद हो सकता है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा संस्थानों को धार्मिक विषयों को केवल ऐच्छिक और अभिभावकों की सहमति के साथ शामिल करना चाहिए, ताकि छात्रों को किसी भी तरह का अनुचित दबाव या संवेदनशीलता का सामना न करना पड़े।
उत्तराखंड के इस प्राइवेट स्कूल में सुबह की प्रार्थना में कलमा पढ़ाए जाने का मसला न सिर्फ स्थानीय स्तर पर बल्कि सोशल मीडिया पर भी तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है। हिंदू संगठनों के विरोध और प्रशासन की संज्ञान लेने के बाद यह मामला जांच के दायरे में है।

