देवघर। झारखंड सरकार द्वारा राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त और सुदृढ़ करने के तमाम दावों के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ताजा मामला दुमका जिला अंतर्गत सरियाहाट थाना क्षेत्र का है, जहां एक गंभीर मरीज को समय पर 108 एंबुलेंस सेवा उपलब्ध नहीं हो सकी। मजबूरन परिजनों को मरीज को मालवाहक ऑटो में पुआल बिछाकर करीब तीन घंटे की मशक्कत के बाद देवघर सदर अस्पताल लाना पड़ा। यह घटना न सिर्फ सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलती है, बल्कि गरीब और जरूरतमंद मरीजों की बदहाल स्थिति को भी उजागर करती है।

108 एंबुलेंस सेवा पर गंभीर आरोप
मरीज के परिजनों ने 108 एंबुलेंस सेवा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। परिजनों का कहना है कि मरीज की हालत नाजुक होने के कारण उन्होंने तत्काल 108 एंबुलेंस को कॉल किया था। शुरुआत में एंबुलेंस के आने की सूचना दी गई, लेकिन बाद में काफी देर तक कोई वाहन नहीं पहुंचा। आरोप है कि इसी दौरान किसी अन्य व्यक्ति ने एंबुलेंस कर्मियों को पैसे का लालच देकर अपने मरीज को पहले ले जाने की व्यवस्था कर ली। नतीजतन, वास्तविक जरूरतमंद मरीज और उसके परिजन घंटों इंतजार करते रह गए।
तीन घंटे की मशक्कत, फिर मालवाहक ऑटो का सहारा
करीब तीन घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार करने के बाद परिजनों के सामने कोई विकल्प नहीं बचा। मरीज की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। ऐसे में परिजनों ने जान जोखिम में डालते हुए एक मालवाहक ऑटो की व्यवस्था की। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह ऑटो में पुआल बिछाकर मरीज को लिटाया गया और देवघर सदर अस्पताल तक लाया गया। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए काफी है।
गरीबों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था सवालों के घेरे में
मरीज के परिजनों का कहना है कि यदि उनके पास पैसे या पहुंच होती, तो शायद एंबुलेंस समय पर मिल जाती। उन्होंने आरोप लगाया कि गरीबों के लिए न तो कोई पैरवी है और न ही सरकारी दावे जमीन पर नजर आते हैं। परिजनों ने कहा कि 108 एंबुलेंस सेवा का उद्देश्य आपात स्थिति में मरीजों को त्वरित और निःशुल्क सहायता प्रदान करना है, लेकिन हकीकत में यह सेवा भी कथित तौर पर लेन-देन और सिफारिश की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली
यह कोई पहला मामला नहीं है जब ग्रामीण इलाकों में एंबुलेंस सेवा की लापरवाही सामने आई हो। सरियाहाट जैसे दूरदराज क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पहले से ही एक गंभीर समस्या है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और जरूरी संसाधनों का अभाव है, ऐसे में गंभीर मरीजों को जिला या प्रमंडलीय अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। जब ऐसी स्थिति में एंबुलेंस सेवा भी फेल हो जाए, तो मरीजों की जान पर बन आती है।
प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी
इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य सरकार द्वारा 108 एंबुलेंस सेवा पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, ताकि जरूरतमंद मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सके। बावजूद इसके, अगर मरीजों को मालवाहक वाहनों से अस्पताल लाना पड़े, तो यह व्यवस्था की विफलता नहीं तो और क्या है।
जांच और कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित एंबुलेंस कर्मियों और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही 108 एंबुलेंस सेवा की निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में किसी भी मरीज को इस तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
तस्वीरें बयां कर रही हैं दर्द
घटना से जुड़ी तस्वीरें सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इन तस्वीरों में मरीज को मालवाहक ऑटो में पुआल के सहारे लिटाकर ले जाते हुए साफ देखा जा सकता है। यह तस्वीरें राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर करती हैं और सरकारी दावों पर सवालिया निशान लगाती हैं।
सरियाहाट से देवघर सदर अस्पताल तक का यह सफर एक मरीज और उसके परिजनों के लिए किसी संघर्ष से कम नहीं था। यह घटना झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के दावों की सच्चाई को सामने लाती है। जरूरत है कि सरकार और प्रशासन ऐसे मामलों को गंभीरता से लें, दोषियों पर कार्रवाई करें और यह सुनिश्चित करें कि 108 एंबुलेंस जैसी आपात सेवाएं वास्तव में जरूरतमंदों तक समय पर पहुंच सकें। तभी आम जनता का भरोसा सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर कायम रह पाएगा।
