By: Vikash Kumar (Vicky )
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले फोन चेक करना, दिनभर नोटिफिकेशन देखते रहना और रात को फोन हाथ में लेकर ही सोना—यह अब सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर 5–10 मिनट में फोन देखने की तलब केवल ‘टाइम पास’ नहीं, बल्कि यह आपकी सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता पर सीधा हमला है।
आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
हालिया डिजिटल बिहेवियर स्टडीज बताती हैं कि औसतन एक व्यक्ति दिन में 90 से 110 बार अपना स्मार्टफोन चेक करता है। युवा वर्ग में यह आंकड़ा और भी ज्यादा है। भारत में 18 से 35 वर्ष के करीब 70% लोग मानते हैं कि वे बिना फोन के बेचैनी महसूस करते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे ‘डिजिटल डिपेंडेंसी’ या ‘फोन एडिक्शन सिंड्रोम’ का शुरुआती लक्षण मानते हैं।
दिमाग पर क्या असर डालता है बार-बार फोन देखना?
विशेषज्ञों के अनुसार, बार-बार स्क्रीन देखने से दिमाग को लगातार छोटे-छोटे डोपामिन शॉट्स मिलते हैं। यही वजह है कि नोटिफिकेशन, रील्स और शॉर्ट वीडियो हमें आकर्षित करते हैं। लेकिन इसका नुकसान यह है कि—
एकाग्रता (Concentration) कम हो जाती है
गहरी सोचने की क्षमता कमजोर होती है
याददाश्त पर असर पड़ता है
निर्णय लेने की क्षमता घटती है
दिल्ली के एक न्यूरोलॉजिस्ट के अनुसार, “जब दिमाग को हर कुछ मिनट में नया स्टिमुलस मिलता है, तो वह लंबी अवधि की सोच के लिए खुद को ट्रेन ही नहीं कर पाता।”

मानसिक स्वास्थ्य पर खतरा
मोबाइल की अधिक लत सिर्फ दिमागी क्षमता ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है। रिसर्च बताती है कि अत्यधिक फोन इस्तेमाल करने वालों में—
एंग्जायटी
डिप्रेशन
नींद न आने की समस्या
चिड़चिड़ापन
जैसी समस्याएं ज्यादा देखी जाती हैं। खासतौर पर सोशल मीडिया पर लगातार तुलना करने की आदत आत्मविश्वास को कमजोर करती है।
बच्चों और युवाओं पर ज्यादा असर
बच्चों और किशोरों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है। ऐसे में मोबाइल की लत उनकी क्रिएटिविटी, पढ़ने की आदत और सामाजिक कौशल को प्रभावित कर रही है। शिक्षकों का कहना है कि आज के बच्चे लंबे समय तक किसी विषय पर ध्यान नहीं दे पाते।
‘डूम स्क्रॉलिंग’ बना नई बीमारी
हर 5 मिनट में फोन उठाकर सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब ‘डूम स्क्रॉलिंग’ कहलाता है। इसमें व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के नकारात्मक या बेकार कंटेंट देखता रहता है। यह आदत दिमाग को थका देती है और तनाव बढ़ाती है।
क्या यह वाकई अलार्म है?
हां। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि अगर आप—
बिना वजह फोन चेक करते हैं
फोन दूर होने पर बेचैनी होती है
किसी काम के बीच बार-बार स्क्रीन देखते हैं
तो यह चेतावनी संकेत हैं कि आपकी मानसिक स्वतंत्रता खतरे में है।
कैसे बचें मोबाइल की इस लत से?
विशेषज्ञ कुछ आसान उपाय सुझाते हैं—
डिजिटल डिटॉक्स: दिन में कम से कम 1–2 घंटे फोन से दूरी बनाएं
नोटिफिकेशन सीमित करें
फोन-फ्री जोन बनाएं (डाइनिंग टेबल, बेडरूम)
पढ़ने और लिखने की आदत डालें
फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएं
समय रहते संभलना जरूरी
मोबाइल फोन सुविधा है, लेकिन जब वही हमारी सोच को नियंत्रित करने लगे, तो खतरे की घंटी बज जाती है। हर 5 मिनट में फोन देखने की आदत अगर अभी नहीं बदली गई, तो आने वाले समय में यह मानसिक क्षमता और रचनात्मक सोच के लिए बड़ा संकट बन सकती है।
