By: Vikash Kumar (Vicky )
भारत ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीजफायर को लेकर चीन के कथित मध्यस्थता दावे को पूरी तरह नकार दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने साफ शब्दों में कहा है कि मई महीने में सीमा पर बढ़े तनाव के दौरान युद्धविराम तक पहुंचने में किसी भी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं रही। भारत ने दो टूक कहा कि वह पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों और विवादों को द्विपक्षीय ढांचे के तहत ही सुलझाने में सक्षम है और इसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, हाल ही में चीन की ओर से यह संकेत दिया गया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच मई में हुए सीजफायर के दौरान उसने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी। चीन के इस बयान को कूटनीतिक हलकों में भारत की संप्रभुता और उसकी विदेश नीति के सिद्धांतों के खिलाफ माना गया। इसके बाद भारतीय सूत्रों ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए स्थिति स्पष्ट की।
भारत का स्पष्ट रुख
भारतीय सूत्रों ने कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य स्तर पर जो संवाद हुआ, वह पूरी तरह द्विपक्षीय था। दोनों देशों के डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस) के बीच स्थापित हॉटलाइन के जरिए बातचीत हुई और उसी के आधार पर सीजफायर पर सहमति बनी। इसमें किसी तीसरे देश, संगठन या अंतरराष्ट्रीय मंच की कोई भूमिका नहीं थी। भारत ने यह भी दोहराया कि उसकी नीति हमेशा से स्पष्ट रही है—पाकिस्तान से जुड़े सभी मुद्दे द्विपक्षीय हैं और इन्हें किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से नहीं सुलझाया जा सकता।

चीन के दावे पर क्यों भड़का भारत?
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह बयान केवल कूटनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की कोशिश भी है। भारत पहले ही कई मंचों पर यह साफ कर चुका है कि वह किसी भी तरह की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करता, खासकर पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में। भारत को यह भी आशंका है कि ऐसे दावे भविष्य में क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं और गलत संदेश दे सकते हैं कि भारत अपने पड़ोसियों के साथ मुद्दे सुलझाने में सक्षम नहीं है।
पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की मांग करता रहा है, लेकिन भारत ने हर बार इसे खारिज किया है। ऐसे में चीन का बयान पाकिस्तान के उसी पुराने नैरेटिव को आगे बढ़ाने जैसा माना जा रहा है।
द्विपक्षीय संवाद ही समाधान
भारत ने दोहराया कि शिमला समझौता और लाहौर घोषणा जैसे समझौते स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दे द्विपक्षीय तरीके से ही सुलझाए जाएंगे। किसी भी तीसरे देश की मध्यस्थता न तो स्वीकार्य है और न ही आवश्यक।
कूटनीतिक संकेत और भविष्य की रणनीति
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह सख्त बयान चीन को स्पष्ट संदेश देने के लिए है कि वह भारत-पाकिस्तान के संबंधों में दखल देने से बचे। साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी संकेत देता है कि भारत अपने निर्णय खुद लेने में सक्षम है और किसी बाहरी दबाव या हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा।
क्षेत्रीय स्थिरता पर भारत की प्राथमिकता
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता उसकी प्राथमिकता है, लेकिन यह शांति संप्रभुता और आपसी समझ के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से। भारत का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों में बाहरी भूमिका हालात को और जटिल बना सकती है।
भारत का संदेश साफ है—भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर या किसी भी अन्य समझौते में कोई तीसरा देश शामिल नहीं था और न ही भविष्य में ऐसी किसी भूमिका की गुंजाइश है। चीन के दावे को खारिज कर भारत ने न केवल अपनी कूटनीतिक स्थिति स्पष्ट की है, बल्कि यह भी जता दिया है कि वह अपनी विदेश नीति के मूल सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करेगा।
