By: Vikash Kumar( Vicky)
महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर चौंकाने वाले मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। नगर निकाय चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा अलग–अलग जगहों पर कांग्रेस और AIMIM के साथ गठबंधन करने की खबरों ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। जिन दलों के खिलाफ बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर लगातार आक्रामक रुख अपनाती रही है, उन्हीं के साथ स्थानीय स्तर पर समझौते ने पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल खड़े कर दिए हैं।

नगर निकाय चुनावों से पहले बदली सियासी तस्वीर
महाराष्ट्र में आगामी नगर निगम और नगर परिषद चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक दल पूरी तरह से सक्रिय हैं। इसी बीच ठाणे जिले के अंबरनाथ में बीजेपी का कांग्रेस के साथ गठबंधन और विदर्भ के अकोला जिले के आकोट में AIMIM के साथ हाथ मिलाना चर्चा का विषय बन गया है। इन गठबंधनों को बीजेपी की “स्थानीय मजबूरी” बताया जा रहा है, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी ने इसे और बड़ा मुद्दा बना दिया है
अंबरनाथ में कांग्रेस-BJP की दोस्ती
ठाणे जिले का अंबरनाथ इलाका शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का गढ़ माना जाता रहा है। यहां बीजेपी लंबे समय से सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय समीकरणों को देखते हुए बीजेपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। माना जा रहा है कि इस गठबंधन का मकसद शिवसेना (उद्धव गुट) और NCP के वोट बैंक में सेंध लगाना है। हालांकि कांग्रेस और बीजेपी का यह साथ कई कार्यकर्ताओं के लिए हैरान करने वाला है। दोनों दल राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं, ऐसे में स्थानीय स्तर पर यह गठबंधन वैचारिक समझ से ज्यादा राजनीतिक गणित का नतीजा माना जा रहा है।
आकोट में AIMIM के साथ गठबंधन
अकोला जिले के आकोट नगर परिषद में बीजेपी द्वारा AIMIM के साथ गठबंधन की खबर ने सियासी बहस को और तेज कर दिया। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अक्सर बीजेपी पर तीखे हमले करते रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों का एक साथ आना बीजेपी के कोर वोटर्स के लिए भी असहज करने वाला बताया जा रहा है। स्थानीय नेताओं का तर्क है कि आकोट में AIMIM का प्रभावशाली वोट बैंक है और बीजेपी अकेले दम पर बहुमत हासिल करने की स्थिति में नहीं थी। इसलिए “स्थानीय परिस्थितियों” को देखते हुए यह फैसला लिया गया।

फडणवीस क्यों नाराज?
इन गठबंधनों के सामने आने के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस की नाराजगी की खबरें भी सामने आई हैं। सूत्रों के मुताबिक, फडणवीस को इन गठबंधनों की जानकारी पहले से नहीं थी या फिर उन्हें पूरी तरह से भरोसे में नहीं लिया गया। बीजेपी के अंदरखाने से संकेत मिल रहे हैं कि फडणवीस पार्टी की वैचारिक लाइन से इस तरह के समझौतों को मेल नहीं खाते मानते हैं। माना जा रहा है कि उन्होंने संगठन को साफ संदेश दिया है कि स्थानीय स्तर पर फैसले लेते वक्त पार्टी की राष्ट्रीय छवि और वैचारिक आधार को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विपक्ष को मिला हमला करने का मौका
बीजेपी के इन फैसलों पर विपक्षी दलों ने तीखा हमला बोला है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि बीजेपी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। उनका आरोप है कि बीजेपी का “हिंदुत्व और राष्ट्रवाद” सिर्फ चुनावी नारा है, जबकि जमीनी हकीकत में पार्टी अवसरवाद की राजनीति कर रही है।
NCP नेताओं ने भी सवाल उठाया कि जो पार्टी AIMIM को अक्सर “वोट कटवा” बताती रही है, वही अब उसके साथ गठबंधन कर रही है।
बीजेपी की सफाई
बीजेपी की ओर से सफाई देते हुए कहा गया है कि नगर निकाय चुनावों में स्थानीय परिस्थितियां अलग होती हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि ये गठबंधन वैचारिक नहीं बल्कि प्रशासनिक और स्थानीय विकास के मुद्दों पर आधारित हैं। बीजेपी ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस या AIMIM के साथ किसी भी तरह के गठबंधन का सवाल ही नहीं उठता।
क्या पड़ेगा चुनावी असर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन गठबंधनों का असर सिर्फ स्थानीय चुनावों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे बीजेपी के कोर वोटर्स में असमंजस पैदा हो सकता है, वहीं विपक्ष को नैरेटिव सेट करने का मौका मिल गया है। हालांकि, अगर बीजेपी इन सीटों पर जीत हासिल करती है तो पार्टी इसे “व्यावहारिक राजनीति” की जीत के रूप में पेश कर सकती

महाराष्ट्र की राजनीति में नया अध्याय?
महाराष्ट्र पहले ही गठबंधन राजनीति के लिए जाना जाता है। शिवसेना का विभाजन, NCP में टूट और बदले हुए समीकरणों के बीच अब बीजेपी के ये स्थानीय गठबंधन राज्य की राजनीति को और जटिल बना रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है और क्या भविष्य में ऐसे और प्रयोग देखने को मिलते हैं।
