By: Vikash Kumar (Vicky)
महाराष्ट्र में चल रहे नगर निकाय चुनावों के बीच मतदान प्रक्रिया को लेकर एक नया और बड़ा विवाद सामने आ गया है। इस बार सवाल ईवीएम या मतदाता सूची का नहीं, बल्कि मतदान के बाद मतदाताओं की उंगली पर लगाई जाने वाली अमिट स्याही को लेकर खड़ा हुआ है। कल्याण से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) की उम्मीदवार उर्मिला तांबे ने इस मुद्दे को सबसे पहले उठाते हुए राज्य चुनाव आयोग (SEC) पर सत्ताधारी दल की मदद करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस विवाद ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि चुनावी निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मतदान के बाद मतदाताओं की उंगली पर लगाई जाने वाली स्याही का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी व्यक्ति दोबारा मतदान न कर सके। यह स्याही आमतौर पर कई दिनों तक नहीं मिटती और इसे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता का अहम हिस्सा माना जाता है। लेकिन कल्याण नगर निगम क्षेत्र में मतदान के बाद सामने आई तस्वीरों और वीडियो में दावा किया जा रहा है कि यह स्याही कुछ ही घंटों में फीकी पड़ गई या साबुन-पानी से आसानी से हट गई। MNS उम्मीदवार उर्मिला तांबे का आरोप है कि यह जानबूझकर किया गया ताकि दोबारा मतदान की संभावना बनाई जा सके। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि एक “सोची-समझी साजिश” है, जिसमें राज्य चुनाव आयोग की भूमिका संदिग्ध नजर आती है।
उर्मिला तांबे का आरोप
उर्मिला तांबे ने मीडिया से बात करते हुए कहा,
“अगर स्याही इतनी कमजोर है कि कुछ घंटों में मिट जाए, तो इसका मतलब साफ है कि चुनावी प्रक्रिया से खिलवाड़ किया जा रहा है। राज्य चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराए, लेकिन यहां ऐसा लगता है कि सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पास ऐसे मतदाताओं के बयान हैं, जिनकी उंगली से स्याही आसानी से हट गई। MNS ने इस मुद्दे पर तत्काल जांच की मांग की है और SEC से स्पष्टीकरण भी मांगा है।
राजनीतिक घमासान तेज
स्याही विवाद सामने आते ही महाराष्ट्र की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर राज्य चुनाव आयोग को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) के नेताओं ने कहा कि अगर स्याही की गुणवत्ता में गड़बड़ी हुई है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। वहीं सत्ताधारी दल ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि विपक्ष हार की आशंका से ऐसे मुद्दे उठा रहा है। सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं का कहना है कि मतदान शांतिपूर्ण ढंग से हुआ और कहीं से भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की कोई आधिकारिक शिकायत नहीं आई है।

राज्य चुनाव आयोग का पक्ष
विवाद बढ़ने के बाद राज्य चुनाव आयोग (SEC) की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। आयोग ने प्रारंभिक बयान में कहा कि मतदान में इस्तेमाल की गई स्याही भारत सरकार द्वारा अनुमोदित कंपनी से खरीदी गई थी और यह पूरी तरह मानकों के अनुरूप है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि स्याही का रंग हल्का पड़ना और पूरी तरह मिट जाना—दोनों अलग-अलग बातें हैं।
SEC के अनुसार,
“अगर कहीं किसी बूथ पर स्याही की गुणवत्ता को लेकर शिकायत मिली है, तो उसकी जांच कराई जाएगी। अभी तक हमें दोबारा मतदान या फर्जी मतदान की कोई ठोस शिकायत नहीं मिली है।” हालांकि आयोग ने यह भी माना कि कुछ स्थानों से शिकायतें आई हैं और उन्हें गंभीरता से लिया जा रहा है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है जब मतदान स्याही को लेकर सवाल उठे हों। इससे पहले भी देश के कई राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान स्याही के जल्दी मिटने की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि स्याही की गुणवत्ता में मामूली गड़बड़ी भी चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर कर सकती है। चुनाव विश्लेषक कहते हैं कि निकाय चुनाव भले ही छोटे स्तर के हों, लेकिन इनसे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं। ऐसे में किसी भी तरह की लापरवाही या पक्षपात लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक हो सकता है।
जनता के बीच बढ़ी चिंता
स्याही विवाद के बाद आम मतदाताओं में भी चिंता देखी जा रही है। कई मतदाताओं का कहना है कि अगर मतदान के बाद पहचान का यह एकमात्र निशान ही भरोसेमंद नहीं रहा, तो निष्पक्ष चुनाव कैसे सुनिश्चित होगा। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर कई तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें लोग अपनी उंगली से स्याही मिटने का दावा कर रहे हैं।
आगे क्या?
फिलहाल सभी की नजरें राज्य चुनाव आयोग की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो न सिर्फ संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है, बल्कि चुनाव परिणामों पर भी असर पड़ सकता है। MNS ने साफ कर दिया है कि अगर उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो वे इस मुद्दे को अदालत तक ले जाएंगे। महाराष्ट्र निकाय चुनावों के बीच यह स्याही विवाद अब सिर्फ तकनीकी सवाल नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग इस विवाद को किस तरह सुलझाता है और क्या मतदाताओं का भरोसा कायम रख पाता है या नहीं।

