By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर को परंपराओं और आस्था का शहर कहा जाता है। यही कारण है कि यहां सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का निर्वहन आज भी पूरे श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाता है। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला से भी अधिक प्राचीन बसंत पंचमी मेला देवघर की धार्मिक पहचान को और मजबूत करता है। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर देवाधिदेव महादेव की नगरी देवघर में बाबा बैद्यनाथ का भव्य तिलकोत्सव मनाया जाता है, जिसे लेकर मिथिलांचल से बड़ी संख्या में कांवरिया बाबा धाम पहुंचने लगे हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन बाबा बैद्यनाथ का तिलकोत्सव होता है। इस परंपरा में शामिल होने वाले मिथिलांचल के कांवरिया माता गौरा के भाई माने जाते हैं, इसलिए देवघर में इन्हें स्नेहपूर्वक बाबा का “साला” कहा जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी पहले हुआ करती थी। मिथिलांचल से आने वाले ये कांवरिया देवघर के विभिन्न इलाकों में डेरा डालते हैं और बसंत पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान से बाबा का तिलकोत्सव संपन्न कराते हैं।
तिलकोत्सव के साथ ही देवघर में पहली होली भी मनाई जाती है। मान्यता है कि बसंत पंचमी से ही मिथिलांचल के कांवरिया होली की शुरुआत कर देते हैं। इस दिन बाबा बैद्यनाथ को अबीर-गुलाल अर्पित कर आनंद और उल्लास के साथ पर्व मनाया जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, तिलकोत्सव के बाद महाशिवरात्रि के दिन बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती का शुभ विवाह संपन्न कराया जाता है। इस अवसर पर एक बार फिर मिथिलांचल के कांवरिया भारी संख्या में देवघर पहुंचते हैं और विवाह उत्सव में भाग लेते हैं।
बैद्यनाथ धाम मंदिर के पुरोहित लंबोदर महाराज बताते हैं कि मिथिलांचल से आने वाले कांवरिया बाबा भोलेनाथ को विशेष रूप से घी अर्पित करते हैं। यह अर्पण उनकी आस्था और भक्ति का प्रतीक है। खास बात यह है कि ये कांवरिया मिथिलांचल से पैदल यात्रा करते हुए पहले उत्तरवाहिनी गंगा पहुंचते हैं, वहां से जल और घी लेकर पैदल ही बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर आते हैं। बसंत पंचमी के दिन तिलकोत्सव संपन्न कराने के बाद ये श्रद्धालु अपने घर लौट जाते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि के अवसर पर बाबा के विवाह के लिए पुनः देवघर पहुंचते हैं।

बसंत पंचमी मेला देवघर के सबसे प्राचीन मेलों में से एक माना जाता है। इस मेले का धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है। मेला क्षेत्र में पारंपरिक गीत-संगीत, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर प्रशासन द्वारा व्यापक इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ पेयजल, साफ-सफाई और चिकित्सा सुविधाओं का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
इन दिनों देवघर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। मिथिलांचल के कांवरिया बाबा बैद्यनाथ का दर्शन-पूजन कर अपने आप को धन्य महसूस कर रहे हैं। पूरा देवघर “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा है। बसंत पंचमी के अवसर पर बाबा धाम का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की कामना कर रहे हैं।
देवघर की यह अनूठी परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत मिसाल भी प्रस्तुत करती है। सदियों से चली आ रही बसंत पंचमी तिलकोत्सव की परंपरा आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है। बाबा बैद्यनाथ की महिमा और देवघर की धार्मिक विरासत देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। बसंत पंचमी मेला एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि देवघर केवल एक तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा का संगम है।

