By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश करता नजर आ रहा है, लेकिन इस बार भारत ने साफ और कड़े शब्दों में जवाब देकर पाकिस्तान की रणनीति को झटका दिया है। भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े मामले में गठित अंतरराष्ट्रीय अदालत के आदेश को अवैध बताते हुए मानने से इनकार कर दिया है।

दरअसल, पाकिस्तान की याचिका पर गठित इस अंतरराष्ट्रीय अदालत ने भारत से उसके कुछ हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के ऑपरेशन रिकॉर्ड साझा करने का निर्देश दिया था। इनमें जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में बनाए गए हाइड्रोपावर प्लांट्स से जुड़े तकनीकी और संचालन से संबंधित दस्तावेज शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि भारत सरकार ने इस आदेश को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यह अदालत ही अवैध रूप से गठित की गई है, इसलिए इसके आदेश मान्य नहीं हैं।

भारत का स्पष्ट रुख है कि सिंधु जल संधि के तहत विवाद निपटाने की जो प्रक्रिया तय की गई है, पाकिस्तान उसे दरकिनार कर अपनी सुविधा के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा ले रहा है। भारत का कहना है कि यह न केवल संधि की भावना के खिलाफ है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों का भी दुरुपयोग है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत ने पहले ही पाकिस्तान को यह साफ कर दिया था कि वह सिंधु जल संधि के तहत तय प्रक्रिया के अलावा किसी अन्य मंच पर इस विवाद को नहीं ले जाएगा। इसके बावजूद पाकिस्तान ने एकतरफा तरीके से अंतरराष्ट्रीय अदालत का गठन करवा लिया और अब उसके आदेशों को भारत पर थोपने की कोशिश कर रहा है।

भारत ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि जिस अदालत ने ऑपरेशन रिकॉर्ड मांगे हैं, उसे भारत की सहमति प्राप्त नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी न्यायिक मंच की वैधता के लिए संबंधित पक्षों की सहमति अनिवार्य होती है। ऐसे में इस अदालत के आदेशों को मानने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान सिंधु जल संधि को एक राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। हर बार जब द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव बढ़ता है, पाकिस्तान इस संधि को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाने लगता है। इसका मकसद भारत पर दबाव बनाना और घरेलू राजनीति में इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करना होता है।

भारत ने यह भी दोहराया है कि उसके सभी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स सिंधु जल संधि के प्रावधानों के तहत ही बनाए गए हैं। इन परियोजनाओं से पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। भारत पहले भी कई बार तकनीकी स्तर पर पाकिस्तान को इस संबंध में जानकारी दे चुका है।
जानकारों के मुताबिक, भारत का यह रुख आने वाले समय में पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक रूप से मुश्किलें बढ़ा सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की स्थिति एक जिम्मेदार और नियमों का पालन करने वाले देश की रही है, जबकि पाकिस्तान पर अक्सर संधियों के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं।

सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी, जिसे विश्व बैंक की मध्यस्थता में तैयार किया गया था। इस संधि को अब तक दोनों देशों के बीच सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय समझौतों में गिना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान द्वारा बार-बार विवाद खड़ा किए जाने से इसकी आत्मा पर सवाल उठने लगे हैं।
भारत सरकार का कहना है कि वह संधि के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करता रहेगा और किसी भी अवैध या एकतरफा अंतरराष्ट्रीय दबाव को स्वीकार नहीं करेगा। भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि वह केवल उसी मंच पर बातचीत करेगा, जो सिंधु जल संधि के तहत वैध रूप से निर्धारित है।
कुल मिलाकर, सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की “कोर्ट-कचहरी” की रणनीति पर भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से जवाब दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि भारत अब ऐसे मामलों में रक्षात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक रुख अपनाने को तैयार है।
