By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा को यूजर्स की निजता (Privacy) के मुद्दे पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या आम नागरिक, खासकर एक साधारण सब्जी बेचने वाला, व्हाट्सएप की जटिल शर्तों और डेटा शेयरिंग पॉलिसी को वास्तव में समझ सकता है?

यह टिप्पणी व्हाट्सएप की विवादित ‘टेक इट ऑर लीव इट’ प्राइवेसी पॉलिसी के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नागरिकों की निजता से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं है और बड़ी टेक कंपनियों को यह समझना होगा कि भारत जैसे देश में डिजिटल साक्षरता का स्तर समान नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि व्हाट्सएप द्वारा यूजर्स को दी जाने वाली शर्तें इतनी जटिल भाषा में होती हैं कि आम आदमी उन्हें पढ़कर भी नहीं समझ पाता। ऐसे में यह कहना कि यूजर ने सहमति दे दी, न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा, “क्या एक सब्जी बेचने वाला या छोटा दुकानदार आपकी शर्तों को समझ पाएगा?”

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर भी चिंता जताई कि व्हाट्सएप अपनी प्राइवेसी पॉलिसी के जरिए यूजर्स के डेटा को मेटा के अन्य प्लेटफॉर्म्स के साथ साझा करता है। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या यूजर्स को इस डेटा शेयरिंग के प्रभावों की सही जानकारी दी जाती है या नहीं।
व्हाट्सएप की ओर से पेश हुए वकील ने दलील दी कि कंपनी सभी नियमों का पालन कर रही है और यूजर्स को स्पष्ट विकल्प दिया जाता है। हालांकि, कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं दिखा। न्यायालय ने कहा कि केवल ‘Agree’ का बटन देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि सहमति सूचित (Informed Consent) हो।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में करोड़ों लोग व्हाट्सएप का इस्तेमाल केवल संवाद के साधन के रूप में करते हैं। उनके लिए यह रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है। ऐसे में ‘टेक इट ऑर लीव इट’ जैसी नीति दबाव डालने के समान है, क्योंकि यूजर के पास व्यावहारिक रूप से कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।
कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि डिजिटल युग में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है और किसी भी कंपनी को इससे ऊपर नहीं रखा जा सकता।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारत में डेटा प्रोटेक्शन और डिजिटल अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो सकती है। इससे न केवल व्हाट्सएप बल्कि अन्य टेक कंपनियों को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
डिजिटल अधिकारों से जुड़े संगठनों ने अदालत की टिप्पणी का स्वागत किया है। उनका कहना है कि लंबे समय से बड़ी टेक कंपनियां यूजर्स की मजबूरी का फायदा उठाती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख आम नागरिकों के हित में एक मजबूत संदेश देता है।

अब इस मामले में अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि कोर्ट इस मुद्दे पर विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर सकता है, जिससे भारत में डेटा सुरक्षा और यूजर प्राइवेसी को लेकर नए मानक तय हो सकते हैं।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी यह साफ संकेत देती है कि देश में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मनमानी की छूट नहीं दी जा सकती। आम नागरिक की समझ, सहमति और निजता को सर्वोपरि माना जाएगा।

