By: Vikash Kumar (Vicky)
कोलकाता/ सुप्रीम कोर्ट ने आज पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका दिया है और राज्य के सरकारी कर्मचारियों को बकाया महंगाई भत्ता (Dearness Allowance – DA) देने का स्पष्ट आदेश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने यह कहा है कि DA कर्मचारियों का वैधानिक और लागू किया जा सकने वाला अधिकार है और इसे राजकीय वित्तीय तंगी को बहाने के रूप में रोका नहीं जा सकता।यह फैसला उन हजारों कर्मचारियों के लिए राहत भरा है जिनका DA वर्षों से बकाया था और जिसका भुगतान सरकार द्वारा लंबित रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों — जस्टिस संजय करोल और जस्टिस पीके मिश्रा — की पीठ ने इस मामले में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं।

क्या है मामला?
पश्चिम बंगाल सरकार ने 2008 से 2019 तक के DA भुगतान में देरी की, जिसमें कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को लागू करने में वर्षों तक रुका रहा। सरकारी कर्मचारियों का दावा था कि DA को नियमित रूप से लागू नहीं किया गया, जबकि सरकार ने अपनी वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देते हुए भुगतान को स्थगित रखा। यह विवाद कोर्ट तक पहुंचा और कर्मचारियों ने इसे कानूनी रूप से चुनौती दी। कोर्ट ने अब स्पष्ट रूप से कहा है कि DA वैधानिक रूप से कर्मचारियों का अधिकार है और इसे रोका नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश — मुख्य बिंदु
* अदालत ने कहा कि DA कर्मचारियों का लागू किया जा सकने वाला वैधानिक अधिकार है और इसे रोकना संविधान के तहत मान्य नहीं है।
* 2008 से 2019 तक के बकाया DA का भुगतान आदेशित किया गया है।
* सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पहले दिए गए अंतरिम आदेश के अनुसार कम से कम 25% राशि 6 मार्च 2026 तक कर्मचारियों को जारी की जाए।
* शेष बकाया DA किस्तों में कैसे दिया जाएगा, इसका निर्धारण एक उच्च स्तरीय समिति करेगी। इस समिति की अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा करेंगी और इसमें अन्य सदस्य भी शामिल होंगे।
* कुल मिलाकर करीब 20 लाख राज्य सरकारी कर्मचारियों को राहत मिलेगी।

क्या बोले कर्मचारी और सरकार?
सरकारी कर्मचारियों के बीच इस फैसले को व्यापक रूप से स्वागत किया जा रहा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि कोर्ट ने उनके अधिकार को न्यायिक संरक्षण दिया है और इसे लागू कर राज्य सरकार को भुगतान के लिए मजबूर किया है। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार ने कई बार अपनी वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देते हुए DA भुगतान टालने की दलील दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि वित्तीय संकट DA भुगतान का बहाना नहीं हो सकता।
न्यायालय ने क्यों दिया आदेश?
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि DA महंगाई की वास्तविक रक्षा का साधन है और कर्मचारियों के जीवनयापन को सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि DA केवल लाभ नहीं बल्कि कार्मिकों के आर्थिक अधिकारों का हिस्सा है। साथ ही सिद्धांत यह है कि यदि किसी वित्तीय व्यवस्था में कानून या नियम लागू होते हैं, तो उनका पालन करना सरकार की जिम्मेदारी है, न कि केवल “इच्छा” का विषय। इसीलिए अदालत ने सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया।

आगे क्या होगा?
अब उच्च स्तरीय समिति यह तय करेगी कि बाकी बकाया DA को किस प्रक्रिया और किस्तों में दिया जाएगा। समिति को रिपोर्ट मार्च 6, 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में पेश करनी है।इससे कर्मचारियों को मिलने वाली राशि का विस्तृत विश्लेषण, किस्तें और समय-सीमा तय होगी। उम्मीद की जा रही है कि इस फैसले से राज्य कर्मचारी वर्ग के आर्थिक अधिकार मजबूत होंगे और भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक सिद्धांत बनेंगे।
यह मामला 2008 के West Bengal Services (Revision of Pay and Allowances) Rules, 2008 के तहत है, जिसमें DA की गणना और उसे लागू करने की विधि तय की गई थी। Calcutta High Court और SAT (State Administrative Tribunal) ने भी पहले कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

क्या यह फैसला महत्वपूर्ण क्यों है?
यह राज्य सरकार कर्मचारियों के कानूनी अधिकारों को लागू नहीं कर पाने के तर्कों को चुनौती देता है।
यह फैसला DA को सरकार द्वारा दी जाने वाली “छूट” नहीं बल्कि कानूनी अधिकार मानता है।
इससे राज्य के लाखों कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी।

