By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली, 6 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने आज एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण फैसले में 30 हफ्ते की गर्भावस्था वाली युवती को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) की अनुमति दी। शीर्ष अदालत ने कहा है कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने या मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह फैसला महिला की प्रजनन स्वतंत्रता (Reproductive Autonomy) को अजन्मे बच्चे के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण बताते हुए सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर कोई महिला गर्भावस्था पूरा करना नहीं चाहती, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता।
क्या था मामला?
यह मामला एक युवती से जुड़ा है जो 17 वर्ष की नाबालिग के रूप में गर्भवती हुई थी और अब 18 वर्ष से अधिक की हो चुकी है। गर्भावस्था लगभग 30 हफ्ते तक पहुंच चुकी थी, जब वह उच्चतम न्यायालय में पहुंची और मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति की याचिका दायर की। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले गर्भ जारी रखने और बाद में बच्चे को गोद देने का सुझाव दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसके विपरीत, बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य बिंदु
प्रजनन स्वतंत्रता सर्वोपरि
अदालत ने कहा कि महिलाओं के निर्णय — विशेष रूप से गर्भ जारी रखने या टर्मिनेशन का निर्णय — उनकी स्वयं की इच्छा और स्वायत्तता पर आधारित होना चाहिए। किसी भी महिला को बिना उसकी सहमति के माँ बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
नाबालिगों के अधिकार
विशेष रूप से नाबालिग लड़की के मामले में, कोर्ट ने दोबारा स्पष्ट किया कि नाबालिग भी अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने की क्षमता रखती है और उसे ऐसा निर्णय लेने में बाध्य नहीं किया जा सकता।

मानसिक और शारीरिक प्रभावों पर ध्यान
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गर्भ जारी रखना युवती के लिए गंभीर मानसिक और शारीरिक आघात का कारण बन सकता है और सामाजिक कलंक का सामना भी करना पड़ सकता है।
भारत में प्रजनन अधिकार और कानूनी ढांचा
भारत में गर्भपात से जुड़े प्रावधान Medical Termination of Pregnancy (MTP) Act, 1971 के तहत नियंत्रित होते हैं। इस कानून में समय-सीमा और विशेष स्थितियों के लिए मानदंडी निर्धारित की गई है:
सामान्यतः गर्भावस्था को 20 सप्ताह तक समाप्त करने की अनुमति एक डॉक्टर की सलाह पर दी जाती है।

20–24 सप्ताह के बीच termination के लिए दो डॉक्टरों की सिफारिश ज़रूरी होती है, और कुछ विशेष स्थितियों के लिए अस्थायी बोर्ड की अनुमति ली जाती है।
24 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था में केवल गंभीर परिस्थितियों जैसे भ्रूण में गंभीर विसंगतियों पर ही मेडिकल बोर्ड termination की अनुमति दे सकता है।
फिर भी, इस फैसले में अदालत ने समय सीमा की सीमाओं से आगे बढ़कर मानव अधिकारों, महिला की मानसिक स्वतंत्रता तथा सामाजिक और व्यक्तिगत प्रभावों पर ज़ोर दिया है।

यह फैसला भारत में महिलाओं के बॉडी ऑटोनॉमी (शरीर पर नियंत्रण) और प्रजनन अधिकारों (Reproductive Rights) की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने यह मानते हुए निर्णय दिए हैं कि महिलाओं को गर्भावस्था समाप्त करने का निर्णय लेने का अधिकार है और इससे उनका निजी निर्णय प्रभावित नहीं होना चाहिए।

दुनियाभर में प्रजनन अधिकारों की बहस जारी है, लेकिन भारत की शीर्ष अदालत ने आज अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक और मानवाधिकारों से जुड़े दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
