By: Vikash Kumar (Vicky)
देश में बच्चों के लगातार लापता होने की बढ़ती घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से गंभीर सवाल पूछे हैं। अदालत ने कहा है कि सरकार यह जांच करे कि क्या इन मामलों के पीछे कोई राष्ट्रव्यापी संगठित नेटवर्क काम कर रहा है या फिर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्तर पर ऐसी घटनाएं हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हाल के दिनों में सामने आई उन खबरों के बाद आई है जिनमें बच्चों के अचानक गायब होने की घटनाएं तेजी से बढ़ती दिखाई दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

नेटवर्क या अलग-अलग घटनाएं, कोर्ट ने मांगा स्पष्ट जवाब
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह पता लगाना बेहद जरूरी है कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई सामान्य पैटर्न है या फिर ये सभी मामले एक-दूसरे से अलग हैं। अदालत ने केंद्र सरकार से निर्देश दिया कि वह देश के सभी राज्यों से बच्चों के लापता होने से जुड़े आंकड़े और केस स्टेटस एकत्र करे। बेंच ने यह भी कहा कि यदि इन मामलों में कोई संगठित गिरोह या नेटवर्क शामिल है तो उसकी पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाए।

सरकार ने बताया डेटा जुटाने की प्रक्रिया, कुछ राज्यों से जानकारी बाकी
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी उपस्थित रहीं। उन्होंने अदालत को बताया कि कई राज्यों से बच्चों के लापता होने के मामलों का डेटा प्राप्त हो चुका है और इन मामलों में चल रहे मुकदमों की जानकारी भी जुटाई गई है। हालांकि अभी भी करीब एक दर्जन ऐसे राज्य हैं जिन्होंने अब तक अपनी जानकारी साझा नहीं की है। सरकार ने कहा कि जब तक सभी राज्यों से पूर्ण डेटा प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है। इस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि उसे यह स्पष्ट जानना है कि क्या यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर फैली हुई है या फिर राज्य स्तर तक सीमित है।

बचाए गए बच्चों के इंटरव्यू का सुझाव, राज्यों को चेतावनी
बेंच ने यह भी सुझाव दिया कि जिन बच्चों को किडनैपिंग से बचाया गया है या जो वापस मिल चुके हैं, उनके विस्तृत इंटरव्यू लिए जाएं। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि अपराधी किस तरह काम करते हैं और किन तरीकों से बच्चों को निशाना बनाया जाता है। अदालत ने उन राज्यों पर भी नाराजगी जताई जिन्होंने अब तक डेटा उपलब्ध नहीं कराया है और संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर सख्त आदेश जारी किए जा सकते हैं। केंद्र सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि सभी राज्यों से जानकारी जुटाने की प्रक्रिया तेजी से जारी है।

एनजीओ की याचिका पर सुनवाई, पहले भी दिए गए थे सख्त निर्देश
दरअसल इस मामले की सुनवाई एक एनजीओ द्वारा दाखिल याचिका पर हो रही है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर को केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि पिछले छह वर्षों में देशभर में लापता हुए बच्चों का पूरा डेटा एकत्र किया जाए। अदालत ने गृह मंत्रालय को यह भी कहा था कि डेटा को संकलित कर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे और आम लोग भी स्थिति से अवगत हो सकें।

हर 8 मिनट में एक बच्चा गायब होने की रिपोर्ट पर कोर्ट की सख्ती
सुनवाई के दौरान अदालत ने उस रिपोर्ट का भी उल्लेख किया जिसमें दावा किया गया था कि देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो जाता है। अदालत ने इस आंकड़े को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत और प्रभावी मैकेनिज्म बनाना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब तक ठोस डेटा और विश्लेषण नहीं होगा, तब तक इस गंभीर समस्या से प्रभावी तरीके से निपटना संभव नहीं है। अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह जल्द से जल्द पूरा डेटा जुटाकर ठोस रणनीति तैयार करे ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।

यह खबर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और न्यायालय की कार्यवाही पर आधारित है। आधिकारिक आदेश और विस्तृत जानकारी के लिए संबंधित सरकारी और न्यायिक स्रोतों की पुष्टि आवश्यक है।


