By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। डिजिटल युग में इंटरनेट बच्चों की पढ़ाई, मनोरंजन और सामाजिक जुड़ाव का अहम जरिया बन चुका है, लेकिन इसके साथ जुड़े खतरे भी तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल ही में जारी एक सर्वे रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि हर दूसरा भारतीय बच्चा या तो साइबर बुलिंग का शिकार हो चुका है या उसने इंटरनेट पर गलत और आपत्तिजनक कंटेंट देखा है। इस स्थिति ने अभिभावकों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है।

सर्वे के अनुसार, लगभग 50 प्रतिशत माता-पिता का मानना है कि उनके बच्चों ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री देखी है जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं थी। वहीं, बड़ी संख्या में बच्चों को सोशल मीडिया, गेमिंग प्लेटफॉर्म और चैट ऐप्स पर साइबर बुलिंग का सामना करना पड़ा है। साइबर बुलिंग में अपमानजनक मैसेज, फर्जी प्रोफाइल बनाकर बदनाम करना, धमकी देना या सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना जैसी घटनाएं शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती पहुंच और स्मार्टफोन के आसान इस्तेमाल ने बच्चों को ऑनलाइन दुनिया से जोड़ तो दिया है, लेकिन सुरक्षा उपायों की कमी और निगरानी के अभाव में वे कई जोखिमों के संपर्क में आ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, साइबर बुलिंग का असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ता है। इससे उनमें आत्मविश्वास की कमी, अवसाद, चिंता, आक्रामक व्यवहार और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।

सर्वे में यह भी सामने आया कि कई बच्चे डर या शर्म की वजह से अपने माता-पिता को इन घटनाओं के बारे में नहीं बताते। कुछ मामलों में माता-पिता को तब पता चलता है जब बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई देता है। जैसे कि पढ़ाई में गिरावट, चिड़चिड़ापन, अकेले रहना पसंद करना या अचानक सोशल मीडिया से दूरी बना लेना।

माता-पिता के सामने एक बड़ी चुनौती शिकायत दर्ज कराने और कार्रवाई करवाने की प्रक्रिया को समझना भी है। कई अभिभावकों ने बताया कि उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि साइबर बुलिंग या आपत्तिजनक कंटेंट की शिकायत कहां और कैसे करें। हालांकि भारत में साइबर क्राइम पोर्टल और हेल्पलाइन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण उनका पर्याप्त उपयोग नहीं हो पा रहा है।

शिक्षाविदों का मानना है कि स्कूल स्तर पर डिजिटल साक्षरता (डिजिटल लिटरेसी) को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि इंटरनेट का सुरक्षित उपयोग कैसे करें, अपनी निजी जानकारी को कैसे सुरक्षित रखें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत बड़े लोगों को दें। इसके साथ ही, माता-पिता को भी तकनीकी जानकारी बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर संतुलित निगरानी रख सकें।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि घर में ‘ओपन कम्युनिकेशन’ का माहौल बनाया जाए, ताकि बच्चे बिना डर के अपनी समस्याएं साझा कर सकें। स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना, पैरेंटल कंट्रोल टूल्स का उपयोग करना और बच्चों के साथ नियमित संवाद करना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त नियम लागू करने चाहिए।

सरकार भी समय-समय पर डिजिटल सुरक्षा को लेकर दिशा-निर्देश जारी करती रही है। साइबर अपराध से निपटने के लिए विशेष पोर्टल (cybercrime.gov.in) और हेल्पलाइन नंबर 1930 उपलब्ध हैं, जहां ऑनलाइन शिकायत दर्ज की जा सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के हर स्तर पर जागरूकता और सहयोग जरूरी है।

डिजिटल युग में बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना संभव नहीं है, लेकिन उन्हें सुरक्षित डिजिटल वातावरण देना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि समय रहते साइबर बुलिंग और गलत कंटेंट पर रोक लगाने के प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

इसलिए जरूरी है कि अभिभावक, शिक्षक, सरकार और टेक कंपनियां मिलकर बच्चों के लिए सुरक्षित ऑनलाइन दुनिया सुनिश्चित करें। जागरूकता, संवाद और तकनीकी सुरक्षा उपाय ही इस चुनौती से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका हैं।

