By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश को पलटते हुए कड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यौन अपराध, विशेषकर बच्चों से जुड़े मामलों में, न्यायिक दृष्टिकोण केवल तकनीकी कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसमें संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी भी झलकनी चाहिए। अदालत ने कहा कि POCSO जैसे कड़े कानून के बावजूद यदि ऐसे अपराध बढ़ रहे हैं, तो न्याय व्यवस्था, जांच एजेंसियों और समाज—तीनों को आत्ममंथन करना होगा।

क्या है पूरा मामला?
दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक यौन अपराध से जुड़े मामले में ऐसा फैसला दिया था, जिसे लेकर व्यापक विवाद खड़ा हो गया। फैसले में अपराध की प्रकृति को लेकर की गई टिप्पणी पर सवाल उठे और इसे पीड़ित पक्ष के प्रति असंवेदनशील बताया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने उस आदेश को बदलते हुए हाई कोर्ट को फटकार लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यौन अपराधों, खासकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में न्यायिक भाषा और दृष्टिकोण अत्यंत संतुलित और संवेदनशील होना चाहिए। अदालत ने यह भी दोहराया कि POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को व्यापक सुरक्षा प्रदान करना है और उसकी व्याख्या उसी भावना के अनुरूप की जानी चाहिए।
कानूनी तर्क के साथ संवेदना भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में केवल तकनीकी पहलुओं के आधार पर निर्णय देना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि फैसले का सामाजिक प्रभाव क्या होगा और वह पीड़ित के मनोवैज्ञानिक हितों को किस तरह प्रभावित करेगा।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी केवल कानून की धाराओं को पढ़कर फैसला सुनाना नहीं है, बल्कि समाज को सही संदेश देना भी है। खासकर जब मामला बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा हो, तब अदालतों को अधिक सजग और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
POCSO कानून के बावजूद क्यों बढ़ रहे हैं मामले?
भारत में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस’ (POCSO) अधिनियम लागू है, जो बेहद सख्त प्रावधानों से लैस है। इसके बावजूद राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों में हर साल ऐसे मामलों की संख्या में वृद्धि देखने को मिलती है।

इस पर विशेषज्ञों की राय है कि इसके कई कारण हो सकते हैं:
1.जागरूकता में वृद्धि: पहले जिन मामलों की रिपोर्टिंग नहीं होती थी, अब वे दर्ज हो रहे हैं। जागरूकता अभियान और मीडिया की सक्रियता ने पीड़ितों को सामने आने का साहस दिया है।
2.सामाजिक ढांचे की कमजोरी: कई मामलों में अपराधी पीड़ित का परिचित या परिवार का सदस्य होता है, जिससे बच्चों की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
3. जांच और ट्रायल में देरी: लंबित मामलों की अधिक संख्या भी न्याय में देरी का कारण बनती है, जिससे अपराधियों में भय कम होता है।
4. डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग: इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के साथ ऑनलाइन ग्रूमिंग और साइबर शोषण के मामले भी बढ़े हैं।

न्यायपालिका की भूमिका और सामाजिक जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे न्याय तंत्र के लिए एक संदेश है। अदालत ने यह संकेत दिया है कि कानून की व्याख्या करते समय जमीनी हकीकत और पीड़ित की स्थिति को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि POCSO जैसे कानून तभी प्रभावी होंगे, जब:
पुलिस जांच निष्पक्ष और त्वरित हो,
फास्ट ट्रैक अदालतों में समयबद्ध सुनवाई हो,
पीड़ितों के लिए काउंसलिंग और पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था हो,
और समाज में लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा दिया जाए।

क्या केवल कानून से रुकेंगे अपराध?
सवाल यह भी है कि क्या केवल कड़े कानून बना देने से अपराध रुक सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि कानून आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। बच्चों के प्रति संवेदनशील पारिवारिक वातावरण, स्कूलों में लैंगिक शिक्षा, और समाज में जागरूकता—ये सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद उम्मीद की जा रही है कि निचली अदालतें और हाई कोर्ट ऐसे मामलों में अधिक सतर्कता बरतेंगी। न्यायिक फैसलों में भाषा और तर्क की संवेदनशीलता पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता की अहमियत को रेखांकित करता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित आदेश को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने साफ संदेश दिया है कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में कोई ढिलाई या तकनीकी चूक स्वीकार्य नहीं होगी।
POCSO कानून के बावजूद बढ़ते मामलों ने समाज और सरकार दोनों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। अब जरूरत है कि कानून, न्यायपालिका, पुलिस और समाज—सभी मिलकर एक ऐसा माहौल तैयार करें, जहां बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो और अपराधियों में कानून का वास्तविक भय दिखाई दे।

