By: Mala Mandal
मेदिनीनगर (पलामू)। पलामू जिले के छतरपुर और नौडीहा बाजार प्रखंड क्षेत्र में कथित अवैध पत्थर खनन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वैध खनन लीज की आड़ में बड़े पैमाने पर पहाड़ों का दोहन किया जा रहा है, जिसके कारण कई पहाड़ियों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। इस मुद्दे ने अब पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक निगरानी और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दावा है कि चैनपुर से लेकर छतरपुर तक दो दर्जन से अधिक पहाड़ियां खनन गतिविधियों की भेंट चढ़ चुकी हैं। जिन स्थानों पर कभी विशाल पहाड़ मौजूद थे, वहां अब गहरे गड्ढे, मलबे के ढेर और उजाड़ भूमि दिखाई देती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लगातार हो रहे खनन कार्यों के कारण क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना तेजी से बदल रही है।
जानकारी के अनुसार चैनपुर क्षेत्र के बुढ़ीबीर, चोटहासा, करसो, खोरही और सेमरा की पहाड़ियों के अलावा छतरपुर प्रखंड के मुनकेरी, बिसुनपुरा, ढकनाथान और मुकना सहित कई पहाड़ियां गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। वहीं रसीटांड़, सलैया, सिलदाग, चेराईं, बरडीहा, गोरहो, हड़ही और आसपास के इलाकों की पहाड़ियों पर भी खतरा मंडराने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कई अन्य पहाड़ियां भी पूरी तरह समाप्त हो सकती हैं।

इस मामले को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी आवाज उठने लगी है। झामुमो के केंद्रीय समिति सदस्य एवं जिला प्रवक्ता चंदन प्रकाश सिन्हा ने पूर्व में जारी एक प्रेस वक्तव्य में आरोप लगाया था कि क्षेत्र के कई खनन पट्टों से जुड़े दस्तावेजों में अनियमितताएं हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि कुछ मामलों में भूमि की प्रकृति बदलकर लीज प्राप्त करने की कोशिश की गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन मामले को लेकर जांच की मांग लगातार उठ रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में बड़ी संख्या में पत्थर और गिट्टी लदे वाहन प्रतिदिन विभिन्न राज्यों की ओर जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण सड़क सुरक्षा प्रभावित हो रही है। कई गांवों में लोगों ने धूल, शोर और दुर्घटनाओं के बढ़ते खतरे को लेकर चिंता व्यक्त की है। ग्रामीणों के अनुसार कई बार तेज रफ्तार वाहनों के कारण जान-माल की क्षति की घटनाएं भी सामने आई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित खनन गतिविधियां किसी भी क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। पहाड़ों के कटाव और वन क्षेत्रों के नुकसान का सीधा असर जल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु पर पड़ता है। छतरपुर और नौडीहा बाजार क्षेत्र के लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में तापमान में वृद्धि और भूजल स्तर में गिरावट देखने को मिली है। हालांकि इसके लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर चिंता लगातार बढ़ रही है।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े जानकारों का कहना है कि पहाड़ी और वन क्षेत्र जंगली जीवों के प्राकृतिक आवास होते हैं। यदि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन होता है तो वन्यजीवों का आवास प्रभावित होता है, जिसके कारण वे आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर सकते हैं। इससे मानव और वन्यजीव संघर्ष की संभावना भी बढ़ जाती है।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी स्थानीय लोगों ने गंभीर चिंता जताई है। पत्थर क्रशर इकाइयों और परिवहन के दौरान उड़ने वाली धूल को लेकर लोगों का कहना है कि क्षेत्र की वायु गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पत्थर की धूल में मौजूद महीन कण लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाने पर फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं का कारण बन सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को दमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

स्थानीय नागरिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि खनन गतिविधियां निर्धारित नियमों एवं पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप संचालित हों। लोगों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण विकास के साथ-साथ समान रूप से आवश्यक है। यदि समय रहते प्रभावी निगरानी और नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
फिलहाल क्षेत्र में खनन गतिविधियों को लेकर बहस तेज है और लोगों की नजर प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है। पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग के बीच सामंजस्य स्थापित करना प्रशासन और संबंधित विभागों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

