By: Mala Mandal
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंध की खुलकर सराहना की है। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में बच्चों और युवाओं की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले को डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक सकारात्मक और दूरदर्शी कदम बताया।

प्रधानमंत्री मोदी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दुनिया के कई देशों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, सोशल मीडिया की लत और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ते जोखिमों को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया का प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार और सुरक्षा पर पड़ सकता है।
क्या है ऑस्ट्रेलिया का फैसला?
ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के उपयोग पर सख्त नियम लागू करने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य बच्चों को ऑनलाइन बुलिंग, फेक न्यूज, अनुचित कंटेंट, साइबर अपराध और सोशल मीडिया की लत से बचाना है। सरकार का मानना है कि कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया कई बार मानसिक तनाव, आत्मविश्वास में कमी और सामाजिक दबाव का कारण बनता है। इसलिए डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के इस मॉडल की प्रशंसा करते हुए कहा कि डिजिटल तकनीक जितनी अवसर लेकर आई है, उतनी ही जिम्मेदारियां भी लेकर आई है। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को सुरक्षित डिजिटल माहौल उपलब्ध कराना सभी देशों की प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रधानमंत्री के अनुसार, तकनीक का उपयोग शिक्षा, नवाचार और विकास के लिए होना चाहिए, लेकिन यदि उसका गलत प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है तो सरकारों और टेक कंपनियों को मिलकर समाधान निकालना होगा।

भारत में भी बढ़ रही है चिंता
भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट उपयोगकर्ता बाजार बन चुका है। करोड़ों बच्चे और किशोर स्मार्टफोन के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। ऐसे में ऑनलाइन गेमिंग, साइबर बुलिंग, फर्जी प्रोफाइल, डिजिटल फ्रॉड और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित होना चाहिए और अभिभावकों को भी डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए।

क्या भारत में भी लागू हो सकता है ऐसा मॉडल?
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ऑस्ट्रेलिया के फैसले की सराहना के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारत भी भविष्य में ऐसा कोई मॉडल अपनाने पर विचार कर सकता है। हालांकि फिलहाल भारत सरकार की ओर से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन डिजिटल सुरक्षा, डेटा प्राइवेसी और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सरकार लगातार नए नियमों और नीतियों पर काम कर रही है।

विशेषज्ञों की राय
डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसके साथ-साथ डिजिटल शिक्षा, अभिभावकों की जागरूकता, स्कूलों में साइबर सुरक्षा की पढ़ाई और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही भी जरूरी है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग बच्चों में तनाव, चिंता, अकेलापन और पढ़ाई में ध्यान की कमी जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।

सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी
दुनिया भर में सरकारें सोशल मीडिया कंपनियों से यह अपेक्षा कर रही हैं कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत आयु सत्यापन प्रणाली, सुरक्षित कंटेंट फिल्टर और बेहतर प्राइवेसी फीचर उपलब्ध कराएं। यदि कंपनियां नियमों का पालन नहीं करती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाने जैसे प्रावधान भी कई देशों में बनाए जा रहे हैं।

अभिभावकों की भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा केवल सरकार या सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है। माता-पिता को भी यह देखना चाहिए कि बच्चे कितना समय ऑनलाइन बिताते हैं, किस प्रकार का कंटेंट देखते हैं और किन लोगों से संपर्क में रहते हैं।
बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करना और उन्हें सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के बारे में जानकारी देना भी बेहद जरूरी माना जाता है।

आगे क्या?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऑस्ट्रेलिया के फैसले की सराहना के बाद भारत में डिजिटल सुरक्षा और बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर बहस और तेज हो सकती है। आने वाले समय में सरकार, नीति विशेषज्ञ, शिक्षा जगत और टेक कंपनियां मिलकर ऐसे उपायों पर विचार कर सकती हैं जो बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण प्रदान करें।

फिलहाल यह स्पष्ट है कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा एक वैश्विक चुनौती बन चुकी है और ऑस्ट्रेलिया का यह कदम दुनिया के अन्य देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। भारत में भी इस विषय पर आगे व्यापक चर्चा और नीतिगत पहल देखने को मिल सकती है।

