By: Mala Mandal
नई दिल्ली/रांची। संसद के आगामी मानसून सत्र में केंद्र सरकार एक बार फिर **’वन नेशन-वन इलेक्शन’ (One Nation One Election)** को लेकर बड़ा कदम उठा सकती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मोदी सरकार इस विषय से जुड़ा महत्वपूर्ण विधेयक संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है। इस संभावना के सामने आते ही झारखंड की राजनीति भी गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के बीच इस मुद्दे पर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।

वन नेशन-वन इलेक्शन का उद्देश्य देशभर में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराना है। केंद्र सरकार का दावा है कि इससे चुनावी खर्च में भारी कमी आएगी, प्रशासनिक व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी और बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे। दूसरी ओर विपक्षी दल इसे संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता के लिए चुनौती मान रहे हैं।

झारखंड में इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। भाजपा नेताओं का कहना है कि देशहित में एक साथ चुनाव कराना समय की मांग है। उनके अनुसार इससे सरकारी मशीनरी पर दबाव कम होगा, सुरक्षा बलों की बार-बार तैनाती की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी। भाजपा का दावा है कि लोकतंत्र को अधिक मजबूत और प्रभावी बनाने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक सुधार होगा।

वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इस प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि भारत विविधताओं वाला देश है, जहां हर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। ऐसे में सभी राज्यों में एक साथ चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं है। उनका आरोप है कि इस तरह की व्यवस्था से क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक भूमिका कमजोर हो सकती है और राज्यों से जुड़े स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय चुनावी विमर्श में दब सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वन नेशन-वन इलेक्शन का मुद्दा केवल चुनावी सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए संविधान में व्यापक संशोधन की आवश्यकता होगी। संविधान के कई अनुच्छेदों में बदलाव किए बिना इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं माना जाता। इसके अलावा संसद में आवश्यक बहुमत और कई राज्यों की सहमति भी महत्वपूर्ण होगी।

केंद्र सरकार पहले भी इस विषय पर गंभीरता से काम कर चुकी है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति ने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसके बाद सरकार ने इस दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए थे। अब माना जा रहा है कि मानसून सत्र में इस मुद्दे पर नई पहल देखने को मिल सकती है। हालांकि सरकार की ओर से विधेयक पेश किए जाने की अंतिम आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि देशभर में एक साथ चुनाव कराए जाते हैं तो चुनाव आयोग, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा। वहीं आलोचकों का तर्क है कि यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त हो जाए या सरकार गिर जाए, तो ऐसी स्थिति में पूरी व्यवस्था को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

झारखंड सहित कई राज्यों में इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। भाजपा इसे बड़े चुनावी सुधार के रूप में जनता के सामने रख रही है, जबकि JMM और अन्य विपक्षी दल इसे लोकतांत्रिक ढांचे और संघीय व्यवस्था से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में संसद का आगामी मानसून सत्र इस मुद्दे पर काफी अहम माना जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि सरकार यह विधेयक संसद में पेश करती है तो उस पर लंबी और विस्तृत बहस होना तय है। पक्ष और विपक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ सामने आएंगे और देशभर की निगाहें संसद की कार्यवाही पर टिकी रहेंगी। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि अन्य क्षेत्रीय दल इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि वन नेशन-वन इलेक्शन का मुद्दा आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहेगा। संसद के मानसून सत्र में सरकार की रणनीति, विपक्ष का विरोध और संभावित संवैधानिक बहस इस विषय को देश के सबसे चर्चित राजनीतिक मुद्दों में शामिल कर सकती है।


