By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी अब रक्षा क्षेत्र में एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 11 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने वाले हैं। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब दुनिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत अपनी रक्षा तैयारियों को और मजबूत करने पर जोर दे रहा है। दोनों नेताओं की बैठक में रक्षा सहयोग, सैन्य तकनीक, ऊर्जा और रणनीतिक मुद्दों के साथ-साथ BrahMos मिसाइल के अगले चरण और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की लंबित डिलीवरी पर चर्चा होने की उम्मीद है। भारत और रूस की रक्षा साझेदारी काफी पुरानी है। भारतीय सशस्त्र बलों के पास लंबे समय से रूसी मूल के कई महत्वपूर्ण हथियार और सैन्य प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों का सहयोग केवल हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रहा है। अब संयुक्त विकास, तकनीक हस्तांतरण, भारत में उत्पादन और रक्षा निर्यात जैसे क्षेत्रों पर भी जोर बढ़ा है। इसी दिशा में BrahMos सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है।

BrahMos NG पर बढ़ी उम्मीदें
BrahMos भारत और रूस के संयुक्त रक्षा सहयोग की सबसे चर्चित परियोजनाओं में शामिल है। BrahMos Aerospace भारत के DRDO और रूस की NPO Mashinostroyenia के सहयोग से विकसित हुआ है। अब दोनों देश इस मिसाइल परिवार को आगे बढ़ाने और इसकी क्षमताओं में सुधार करने की दिशा में काम कर रहे हैं। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक मोदी-पुतिन बैठक में BrahMos के अपग्रेड और अगले चरण के विकास पर बातचीत हो सकती है। BrahMos NG को लेकर भी काफी उम्मीदें हैं। इसका उद्देश्य मौजूदा BrahMos की तुलना में अधिक कॉम्पैक्ट और हल्का विकल्प तैयार करना है, जिससे इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ सके। हालांकि, इसके बारे में अंतिम परिचालन क्षमता, तैनाती और डिलीवरी से जुड़ी आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा। BrahMos की खासियत यह है कि यह सिर्फ भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करने वाली परियोजना नहीं रह गई है। इसके अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी संभावनाएं बढ़ी हैं। फिलीपींस सहित कुछ देशों ने BrahMos में रुचि दिखाई है। हाल ही में अमेरिका और फिलीपींस के संयुक्त सैन्य अभ्यास में भी BrahMos से जुड़ी ट्रेनिंग सामने आई, जिसने इस सिस्टम की अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक अहमियत को फिर चर्चा में ला दिया।

S-400 पर भी अहम बातचीत
मोदी-पुतिन बैठक में S-400 एयर डिफेंस सिस्टम भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहने वाला है। भारत ने रूस के साथ पांच S-400 रेजिमेंट का समझौता किया था। अब इसकी शेष डिलीवरी को लेकर बातचीत अहम हो गई है। रिपोर्टों के मुताबिक रूस ने 2026 में S-400 की डिलीवरी पूरी करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। S-400 भारत की लंबी दूरी की एयर डिफेंस क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे समय में जब ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य हवाई खतरों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, भारत के लिए मजबूत बहुस्तरीय एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि S-400 की शेष डिलीवरी को भारत अपनी सुरक्षा तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पांचवें सिस्टम की डिलीवरी का कार्यक्रम 2026 में आगे बढ़ाया जाना है। इसलिए 11 सितंबर की बैठक में इसके टाइमलाइन और लॉजिस्टिक से जुड़े मुद्दों पर चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है।

सिर्फ हथियार खरीद तक सीमित नहीं रहेगा रिश्ता
भारत-रूस रक्षा साझेदारी का अगला चरण केवल तैयार हथियारों की खरीद पर निर्भर नहीं रहने वाला है। भारत लगातार ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर दे रहा है। ऐसे में रूस के साथ तकनीक, संयुक्त उत्पादन और भारत में निर्माण की संभावनाएं दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। रक्षा क्षेत्र के साथ-साथ दोनों देशों के बीच परमाणु ऊर्जा, तेल, औद्योगिक सहयोग और रणनीतिक तकनीक के क्षेत्र में भी बातचीत जारी है। मोदी-पुतिन बैठक के एजेंडे में Su-57 जैसे उन्नत लड़ाकू विमान, परमाणु ऊर्जा और व्यापक आर्थिक सहयोग जैसे विषयों के शामिल होने की भी रिपोर्टें हैं। भारत के लिए रूस के साथ संबंधों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि नई दिल्ली अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहती है। भारत अमेरिका, फ्रांस, इजरायल और अन्य देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, लेकिन रूस अभी भी भारतीय रक्षा ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

बदलती दुनिया में भारत-रूस संबंध
यूक्रेन युद्ध और रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण भारत-रूस संबंधों के सामने कई नई चुनौतियां भी आई हैं। भुगतान व्यवस्था, सप्लाई चेन और रक्षा उपकरणों की डिलीवरी जैसे मुद्दे पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसके बावजूद दोनों देशों ने अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखा है। भारत का दृष्टिकोण साफ है कि वह किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग साझेदारों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध मजबूत करे। रूस के साथ रक्षा सहयोग इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।

11 सितंबर को होने वाली मोदी-पुतिन बैठक इसलिए केवल दो नेताओं की मुलाकात नहीं होगी, बल्कि यह आने वाले वर्षों में भारत-रूस रक्षा सहयोग की दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण बातचीत हो सकती है। BrahMos के अगले अपग्रेड से लेकर S-400 की लंबित डिलीवरी, संयुक्त उत्पादन और नई सैन्य तकनीक तक कई मुद्दों पर नजर रहेगी।

अगर दोनों देश रक्षा तकनीक और उत्पादन में सहयोग को और आगे बढ़ाते हैं, तो इसका फायदा भारत की सैन्य क्षमता के साथ-साथ घरेलू रक्षा उद्योग को भी मिल सकता है। आने वाले समय में यह साझेदारी भारत की ‘आत्मनिर्भर रक्षा’ नीति के साथ रूस के तकनीकी सहयोग को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।

कुल मिलाकर, भारत और रूस की डिफेंस पार्टनरशिप अब पारंपरिक हथियार खरीद से आगे बढ़कर तकनीक, संयुक्त विकास और उत्पादन की दिशा में जाती दिखाई दे रही है। ऐसे में 11 सितंबर की मोदी-पुतिन बैठक से निकलने वाले रक्षा संबंधी फैसले आने वाले वर्षों में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी की नई तस्वीर पेश कर सकते हैं।


