By: Vikash Kumar (Vicky)

आजकल स्कूली बच्चों में पीठ, कमर, गर्दन और घुटनों में दर्द की शिकायत तेजी से सुनने को मिल रही है। कई माता-पिता को लगता है कि इसका कारण केवल भारी स्कूल बैग या लंबे समय तक पढ़ाई करना है। हालांकि बच्चों में शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठना, शारीरिक गतिविधि की कमी, पर्याप्त नींद न लेना, पोषण की कमी और लगातार स्क्रीन देखने जैसी आदतें भी समस्या को बढ़ा सकती हैं।
बच्चों की बढ़ती उम्र में हड्डियों और मांसपेशियों का विकास तेजी से होता है। ऐसे में उनके खान-पान और दैनिक गतिविधियों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। अगर बच्चा बार-बार कमर, पीठ या घुटनों में दर्द की शिकायत करता है, तो इसे केवल थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

क्या स्कूल बैग ही बच्चों के पीठ दर्द की वजह है?
भारी या गलत तरीके से पहना गया स्कूल बैग बच्चों के कंधों, गर्दन और पीठ पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। खासकर अगर बच्चा लंबे समय तक एक ही कंधे पर बैग टांगे या बैग जरूरत से ज्यादा भारी हो, तो शरीर की मुद्रा प्रभावित हो सकती है।
लेकिन हर बच्चे में पीठ या कमर दर्द का कारण सिर्फ स्कूल बैग हो, ऐसा जरूरी नहीं है। अगर बैग सामान्य वजन का होने के बावजूद बच्चा लगातार दर्द की शिकायत करता है, तो दूसरे संभावित कारणों पर भी ध्यान देना चाहिए।

लंबे समय तक बैठना भी बन सकता है समस्या
आजकल बच्चे स्कूल के अलावा घर पर भी लंबे समय तक बैठकर पढ़ाई, मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं। लगातार एक ही मुद्रा में बैठे रहने से पीठ और गर्दन की मांसपेशियों पर दबाव पड़ सकता है।
अगर बच्चा पढ़ते समय झुककर बैठता है या लंबे समय तक गर्दन नीचे करके मोबाइल देखता है, तो गर्दन, कंधे और पीठ में खिंचाव महसूस हो सकता है। इसलिए पढ़ाई और स्क्रीन टाइम के बीच छोटे-छोटे ब्रेक लेना जरूरी है।

शारीरिक गतिविधि की कमी पर दें ध्यान
बच्चों के शारीरिक विकास के लिए खेलकूद और नियमित शारीरिक गतिविधि महत्वपूर्ण है। आजकल पढ़ाई और स्क्रीन टाइम के कारण कई बच्चे पहले की तुलना में कम बाहर खेलते हैं।
लगातार निष्क्रिय रहने से मांसपेशियों की ताकत और शारीरिक फिटनेस प्रभावित हो सकती है। उम्र के अनुसार खेलना, चलना, दौड़ना और अन्य शारीरिक गतिविधियां बच्चे की overall fitness के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

कैल्शियम और विटामिन डी की कमी भी हो सकती है वजह
बच्चों की हड्डियों के विकास में कैल्शियम और विटामिन डी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर बच्चे के भोजन में आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर इसकी जांच और डाइट की समीक्षा कराई जा सकती है।
दूध और डेयरी उत्पाद, दालें, कुछ हरी सब्जियां, तिल और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। विटामिन डी के लिए धूप और आहार के साथ जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह महत्वपूर्ण है।
बिना डॉक्टर की सलाह के बच्चों को कैल्शियम या विटामिन डी के सप्लीमेंट देना उचित नहीं है।

बच्चों में घुटनों का दर्द हमेशा हड्डियों की कमजोरी नहीं होता
अगर बच्चा घुटनों में दर्द की शिकायत करता है, तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि उसकी हड्डियां कमजोर हो रही हैं। बच्चों में चोट, खेलकूद के दौरान मांसपेशियों पर दबाव, गलत गतिविधि, शरीर के विकास से जुड़े कारण या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी दर्द की वजह हो सकती हैं।
इसलिए बार-बार होने वाले दर्द को केवल कैल्शियम की कमी मानकर खुद से दवा या सप्लीमेंट देना सही नहीं है।

बच्चे की डाइट में शामिल करें पौष्टिक चीजें
बच्चों की हड्डियों और मांसपेशियों के विकास के लिए संतुलित आहार जरूरी है। उनकी डाइट में प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन डी और अन्य आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए।
दूध, दही, पनीर, दाल, चना, राजमा, अंडा, मछली या मांस जैसे खाद्य पदार्थ परिवार की डाइट और बच्चे की जरूरत के अनुसार शामिल किए जा सकते हैं। फल और सब्जियां भी नियमित भोजन का हिस्सा होनी चाहिए।
बच्चे को केवल एक ही खाद्य पदार्थ पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग पौष्टिक चीजों का संतुलित संयोजन देना बेहतर होता है।

सही बैठने की आदत डालना भी जरूरी
बच्चे को पढ़ते समय पीठ को यथासंभव सीधा रखने और किताब या स्क्रीन को उचित ऊंचाई पर रखने की आदत डालें। बहुत देर तक एक ही स्थिति में बैठने के बजाय बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना या शरीर को आराम देना मददगार हो सकता है।
स्कूल और घर दोनों जगह बच्चे की पढ़ने की जगह उसकी उम्र और लंबाई के अनुकूल होनी चाहिए।
स्कूल बैग कितना भारी होना चाहिए?
बच्चे के बैग का वजन उसकी उम्र, आकार और स्कूल की जरूरतों के अनुसार नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है। बैग में केवल जरूरी किताबें और सामान रखें। भारी चीजों को रोजाना स्कूल लाने की जरूरत हो तो स्कूल से भी इस बारे में बात की जा सकती है।
बैग को दोनों कंधों पर सही तरीके से पहनाना चाहिए। बहुत ढीली या बहुत नीचे लटकती पट्टियां भी बच्चे की मुद्रा को प्रभावित कर सकती हैं।
कब बच्चे को डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
अगर बच्चे को कभी-कभार हल्का दर्द होता है और आराम करने के बाद ठीक हो जाता है, तो उसकी गतिविधियों और दिनचर्या पर नजर रखी जा सकती है। लेकिन अगर दर्द बार-बार हो रहा है या लगातार बना हुआ है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।
खास तौर पर अगर दर्द के साथ सूजन, लालिमा, बुखार, चलने में परेशानी, कमजोरी, चोट के बाद तेज दर्द, रात में बार-बार दर्द से नींद खुलना या वजन कम होना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से जल्द संपर्क करें।
बच्चों को दर्द की दवा खुद से न दें
बच्चे के पीठ, कमर या घुटने में दर्द होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द की दवा, कैल्शियम या अन्य सप्लीमेंट देना सही नहीं है। दर्द का कारण पता करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अगर समस्या लगातार बनी हुई है, तो डॉक्टर बच्चे की उम्र, विकास, शारीरिक गतिविधि, खान-पान और अन्य लक्षणों को देखकर जरूरत के अनुसार जांच की सलाह दे सकते हैं।
माता-पिता इन 5 बातों का रखें ध्यान
बच्चे का स्कूल बैग जरूरत से ज्यादा भारी न हो।
पढ़ाई और स्क्रीन टाइम के बीच नियमित ब्रेक दें।
बच्चे को उम्र के अनुसार रोजाना शारीरिक गतिविधि और खेलकूद का मौका दें।
डाइट में पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व शामिल करें।
बार-बार या तेज दर्द होने पर डॉक्टर की सलाह लें।

सिर्फ बैग को जिम्मेदार मानकर न करें नजरअंदाज
बच्चों में पीठ, कमर या घुटनों का दर्द कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है। भारी स्कूल बैग और गलत posture इसमें भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इन्हें हर मामले में एकमात्र वजह मानना सही नहीं है। बच्चे के खान-पान, शारीरिक गतिविधि, बैठने की आदत और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य लक्षणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
अगर दर्द लगातार बना रहता है, बढ़ रहा है या उसके साथ अन्य लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो समय पर डॉक्टर से जांच कराना सबसे सुरक्षित कदम है।
यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। बच्चों में पीठ, कमर, घुटने या हड्डियों से जुड़ा दर्द अलग-अलग कारणों से हो सकता है। यहां दी गई जानकारी किसी बच्चे के लिए व्यक्तिगत चिकित्सकीय निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। लगातार, तेज या बार-बार होने वाले दर्द तथा किसी अन्य चिंताजनक लक्षण की स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ या योग्य डॉक्टर से सलाह लें। बिना चिकित्सकीय सलाह के बच्चों को दवा या सप्लीमेंट न दें।
