By: Vikash Kumar (Vicky)
भारत में मताधिकार और नागरिकता के संबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई है। उन्होंने कहा कि किसी भारतीय नागरिक के लिए नागरिकता और वोट देने के अधिकार को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची में शामिल होने और वोट देने के अधिकार को नागरिकता से जुड़ा बताते हुए कहा कि किसी नागरिक को उसके मताधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा हो सकता है।

जस्टिस उज्जल भुइयां ने यह टिप्पणी हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वीं जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में की। उनके बयान ऐसे समय आए हैं, जब देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है। हालांकि, उनके संबोधन को किसी लंबित मामले में दिया गया औपचारिक न्यायिक फैसला नहीं माना जाना चाहिए।
नागरिकता और वोट के अधिकार का संबंध
जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक भारतीय नागरिक के नजरिए से वोट देने का अधिकार या मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार उसकी नागरिकता से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत बताते हुए कहा कि नागरिक के व्यक्तित्व से उसके मताधिकार को अलग करना ऐसा होगा, जैसे शरीर से आत्मा को निकाल देना। उनके मुताबिक भारतीय संविधान नागरिकों के दो अलग-अलग वर्गों की कल्पना नहीं करता—एक ऐसा वर्ग जिसके पास वोट देने का अधिकार हो और दूसरा ऐसा वर्ग जो नागरिक होने के बावजूद मतदान के अधिकार से वंचित हो। यदि किसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया संवैधानिक कसौटी पर सवालों के घेरे में आ सकती है।

अनुच्छेद 326 और 14 क्यों हैं महत्वपूर्ण?
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का विशेष उल्लेख किया। संविधान का अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर कराने की व्यवस्था करता है। सामान्य रूप से 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का पात्र भारतीय नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकरण का अधिकार रखता है, हालांकि कानून के तहत निर्धारित सीमित अयोग्यताएं लागू हो सकती हैं। वहीं, अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। जस्टिस भुइयां के तर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि यदि किसी प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों को बिना उचित संवैधानिक आधार के मतदान से बाहर कर दिया जाता है, तो समानता और गैर-मनमानी के सिद्धांत पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की ऐसी छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जा सकती, जो पात्र नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार से प्रभावी रूप से बाहर कर दे। उन्होंने कहा कि कोई भी संस्था संविधान से ऊपर नहीं है।

क्या वोट देना मौलिक अधिकार है?
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में इस बात को स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया है। हालांकि, उन्होंने इसे संविधान से प्राप्त संवैधानिक अधिकार के रूप में महत्वपूर्ण बताया। यानी वोट देने का अधिकार केवल सामान्य कानूनी अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका आधार संविधान के अनुच्छेद 326 में मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में भी मतदान के अधिकार की संवैधानिक प्रकृति पर चर्चा हुई है। 2026 के एक सुप्रीम कोर्ट फैसले में भी न्यायालय ने यह दर्ज किया कि न्यायिक व्याख्या के जरिए वोट देने के अधिकार को केवल वैधानिक अधिकार के बजाय संवैधानिक अधिकार के रूप में देखा गया है।

मतदाता सूची में नाम हटाने को लेकर क्या कहा?
जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मृत मतदाता के मामले को छोड़कर मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति का नाम बिना नोटिस और सुनवाई के हटाया नहीं जाना चाहिए। इसका सीधा संबंध प्राकृतिक न्याय और उचित प्रक्रिया के सिद्धांत से जुड़ता है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है। गलत, मृत या अपात्र लोगों के नाम हटाना और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ पात्र नागरिकों का नाम गलत तरीके से हटना भी उतना ही गंभीर विषय है। यही संतुलन इस पूरी बहस का केंद्र बन गया है।

SIR विवाद के बीच टिप्पणी क्यों अहम?
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है, जब चुनावी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश में बहस चल रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट और अधिक सटीक बनाना है, लेकिन इसे लेकर पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंकाओं और प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी सवाल भी उठाए गए हैं। जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेने के बजाय व्यापक संवैधानिक सिद्धांत पर जोर दिया। उनका मुख्य संदेश यह था कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों भारतीय नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, उसकी संवैधानिक वैधता की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। उन्होंने बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने को मनमाना बताया और कहा कि इसे केवल अलग-अलग तर्कों के सहारे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

लोकतंत्र में वोट की अहमियत
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में वोट केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं है, बल्कि नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। चुनाव के जरिए आम नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनता है और शासन की दिशा तय करने में भागीदारी करता है। जस्टिस भुइयां ने इसी व्यापक लोकतांत्रिक महत्व को नागरिकता के साथ जोड़कर देखा। उन्होंने यह भी कहा कि एक अरबपति और एक रिक्शा चालक के वोट का मूल्य समान होता है। यही समानता लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि या प्रभाव उसके वोट के संवैधानिक मूल्य को बड़ा या छोटा नहीं बनाता।

जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का व्यापक संदेश
जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी का मूल संदेश यह है कि मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी पात्र नागरिकों के मताधिकार की रक्षा करना भी है। चुनावी प्रक्रिया में सुधार के नाम पर यदि किसी पात्र नागरिक का वोट प्रभावित होता है, तो उसके लिए पारदर्शी प्रक्रिया, उचित सूचना और कानूनी सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

उनकी “वोट का अधिकार नागरिकता की आत्मा है” वाली बात इसी लोकतांत्रिक सिद्धांत को रेखांकित करती है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह जस्टिस भुइयां का संवैधानिक दृष्टिकोण और सार्वजनिक संबोधन में दिया गया वक्तव्य है, न कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की कोई नई बाध्यकारी व्यवस्था।
कुल मिलाकर, जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि नागरिकता, मतदाता सूची और मतदान के अधिकार के बीच संवैधानिक संबंध को किस तरह देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव की विश्वसनीयता केवल निष्पक्ष मतदान से नहीं, बल्कि इस भरोसे से भी जुड़ी होती है कि हर पात्र नागरिक को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने का उचित अवसर मिले।

