By: Mala Mandal
Maa Skandmata Katha: शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं। भगवान कार्तिकेय को स्कंद नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण माता पार्वती के इस स्वरूप का नाम स्कंदमाता पड़ा। मां स्कंदमाता की गोद में भगवान कार्तिकेय बाल रूप में विराजमान रहते हैं। माता का यह स्वरूप ममता, वात्सल्य, शक्ति और करुणा का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब तारकासुर नामक असुर के अत्याचारों से देवता परेशान हो गए थे, तब भगवान कार्तिकेय ने देवताओं की रक्षा करने और तारकासुर का वध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भगवान कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति भी कहा जाता है। नवरात्रि में मां स्कंदमाता की पूजा के अवसर पर उनकी कथा सुनने और पढ़ने का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं मां पार्वती को स्कंदमाता क्यों कहा जाता है और भगवान कार्तिकेय ने किस प्रकार तारकासुर के आतंक का अंत किया था।

मां पार्वती को स्कंदमाता क्यों कहा जाता है?
हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां पार्वती भगवान शिव की पत्नी और भगवान कार्तिकेय की माता हैं। भगवान कार्तिकेय को स्कंद, कुमार और षण्मुख जैसे नामों से भी जाना जाता है। जब मां पार्वती अपने पुत्र स्कंद अर्थात भगवान कार्तिकेय के साथ विराजमान होती हैं, तब उनके इस मातृस्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें पांचवां स्वरूप मां स्कंदमाता का है। माता को ममता, त्याग, साहस और मातृत्व की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनकी गोद में विराजमान भगवान कार्तिकेय यह संदेश देते हैं कि मां का स्नेह और आशीर्वाद जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भक्तों को मानसिक शांति, सुख और समृद्धि की कामना करने का अवसर मिलता है। नवरात्रि के पांचवें दिन श्रद्धालु माता की आराधना कर परिवार की खुशहाली और संतान के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

कौन थे तारकासुर, जिसके आतंक से परेशान हो गए थे देवता?
पौराणिक कथाओं में तारकासुर को एक शक्तिशाली असुर बताया गया है। कथा के अनुसार, उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और उनसे वरदान प्राप्त किया। वरदान के कारण वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया और उसे अपनी शक्ति पर घमंड होने लगा। कथाओं में बताया जाता है कि तारकासुर को यह वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकता है। उसे विश्वास था कि भगवान शिव तपस्या में लीन रहते हैं और उनके पुत्र का जन्म होना आसान नहीं होगा। इसी विश्वास के कारण वह स्वयं को लगभग अजेय समझने लगा। vशक्ति प्राप्त करने के बाद तारकासुर ने देवताओं और ऋषि-मुनियों को परेशान करना शुरू कर दिया। उसके अत्याचारों से देवता भयभीत हो गए और स्वर्ग में भी अशांति फैलने लगी। तब देवताओं ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए भगवान ब्रह्मा सहित अन्य देवताओं से सहायता मांगी।

भगवान कार्तिकेय के जन्म की क्यों पड़ी जरूरत?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तारकासुर के वध के लिए भगवान शिव के पुत्र का जन्म आवश्यक था। देवताओं को विश्वास था कि भगवान शिव और मां पार्वती के पुत्र ही उस शक्तिशाली असुर का अंत कर सकते हैं। इसके बाद भगवान शिव और मां पार्वती के पुत्र के रूप में भगवान कार्तिकेय के प्राकट्य की कथा आती है। अलग-अलग पुराणों और क्षेत्रीय परंपराओं में भगवान कार्तिकेय के जन्म से जुड़ी घटनाओं का वर्णन कुछ भिन्न रूपों में मिलता है। कई प्रसिद्ध कथाओं में उनके जन्म को देवताओं की रक्षा और तारकासुर के वध से जोड़ा गया है। भगवान कार्तिकेय बचपन से ही तेजस्वी, पराक्रमी और असाधारण शक्तियों से संपन्न माने जाते हैं। आगे चलकर उन्हें देवताओं की सेना का सेनापति बनाया गया। उनका उद्देश्य देवताओं को तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाना और धर्म की रक्षा करना था।

भगवान कार्तिकेय कैसे बने देवताओं के सेनापति?
जब तारकासुर के अत्याचार बढ़ने लगे, तब देवताओं को ऐसे वीर योद्धा की आवश्यकता थी जो उसका सामना कर सके। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कार्तिकेय को देवताओं की सेना का नेतृत्व सौंपा गया। उनकी वीरता, साहस और युद्ध कौशल के कारण देवताओं को उनसे बड़ी उम्मीदें थीं। भगवान कार्तिकेय को युद्ध और शौर्य का प्रतीक माना जाता है। उनके हाथ में भाला या शक्ति नामक अस्त्र दिखाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को मुरुगन, सुब्रह्मण्य और स्कंद जैसे नामों से भी पूजा जाता है। देवताओं के सेनापति के रूप में भगवान कार्तिकेय ने असुरों की शक्ति का मुकाबला किया। धार्मिक कथाओं में उनके युद्ध को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

भगवान कार्तिकेय ने कैसे किया तारकासुर का अंत?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच हुए युद्ध में भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का सामना किया। तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन भगवान कार्तिकेय ने साहस और पराक्रम के साथ युद्ध किया। कथा के अनुसार, भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य अस्त्र से तारकासुर का वध कर दिया। इस प्रकार देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली और स्वर्ग में फिर से शांति स्थापित हुई। इस विजय को धर्म की अधर्म पर जीत और न्याय की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। भगवान कार्तिकेय की यह कथा बताती है कि शक्ति का उपयोग दूसरों पर अत्याचार करने के लिए नहीं, बल्कि अन्याय का विरोध करने और धर्म की रक्षा करने के लिए होना चाहिए। इसी कारण भगवान कार्तिकेय को वीरता, अनुशासन और साहस का प्रतीक माना जाता है।

मां स्कंदमाता के स्वरूप का क्या है धार्मिक महत्व?
मां स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी माना जाता है। उनकी चार भुजाओं का वर्णन मिलता है। दो हाथों में कमल के फूल, एक हाथ में भगवान कार्तिकेय और एक हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में दिखाया जाता है। कई चित्रों में माता कमल के आसन पर विराजमान दिखाई देती हैं। मां स्कंदमाता को कमल पर विराजमान होने के कारण पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनका वाहन सिंह माना जाता है। माता का यह स्वरूप शक्ति और ममता के अद्भुत संगम को दर्शाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता की पूजा करने से भक्तों को साहस, सकारात्मकता और परिवार के कल्याण की कामना करने का अवसर मिलता है। नवरात्रि के पांचवें दिन माता की पूजा विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है।

नवरात्रि के पांचवें दिन कैसे करें मां स्कंदमाता की पूजा?
नवरात्रि के पांचवें दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करें और मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। माता के सामने दीपक जलाकर फूल, फल, अक्षत और मिठाई अर्पित करें। इसके बाद मां स्कंदमाता के मंत्र का जाप करें और दुर्गा चालीसा या माता की कथा का पाठ करें। पूजा के अंत में आरती करें और परिवार की सुख-शांति तथा खुशहाली की प्रार्थना करें।
मां स्कंदमाता का प्रचलित मंत्र है:
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः।
श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा कर सकते हैं। धार्मिक अनुष्ठान में आस्था, स्वच्छता और श्रद्धा का विशेष महत्व माना जाता है।

मां स्कंदमाता की पूजा से क्या मिलता है संदेश?
मां स्कंदमाता की कथा केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि मातृत्व, साहस और कर्तव्य के महत्व से भी जुड़ी है। माता पार्वती का अपने पुत्र के प्रति स्नेह और भगवान कार्तिकेय का देवताओं की रक्षा के लिए आगे आना यह संदेश देता है कि प्रेम और शक्ति दोनों का उपयोग समाज के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
तारकासुर की कथा को अहंकार और अत्याचार के अंत के रूप में देखा जाता है। भगवान कार्तिकेय का पराक्रम भक्तों को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, अनुशासन बनाए रखने और अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है।
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा करते समय श्रद्धालु माता से परिवार में सुख, शांति और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

यह लेख हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। अलग-अलग पुराणों, धार्मिक ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं में कथाओं के विवरण में अंतर हो सकता है। इसका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी प्रदान करना है।

