By: Vikash Kumar ( Vicky )
देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बड़ा और अहम हस्तक्षेप किया है। शीर्ष अदालत ने अपने ही पहले दिए गए एक आदेश पर अस्थायी रोक लगाते हुए इस मामले में स्थिति यथावत (Status Quo) बनाए रखने का निर्देश दिया है। इस फैसले के बाद न केवल हरियाणा और राजस्थान, बल्कि दिल्ली-NCR क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, खनन, निर्माण और शहरी विकास से जुड़े कई सवाल फिर से केंद्र में आ गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
अरावली पहाड़ियां दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई हैं और इन्हें उत्तर भारत की प्राकृतिक ढाल माना जाता है। यह पर्वत श्रृंखला रेगिस्तान के विस्तार को रोकने, भूजल स्तर बनाए रखने और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती है। बीते वर्षों में यहां खनन, अवैध निर्माण और रियल एस्टेट गतिविधियों में भारी बढ़ोतरी हुई, जिससे अरावली के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया। इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक सख्त आदेश में अरावली क्षेत्र में खनन और गैर-जरूरी निर्माण गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। हालांकि, हालिया सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अपने ही पुराने आदेश पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया है।
क्यों रोका गया अपना ही फैसला?
सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क रखा गया कि पुराने आदेश की व्याख्या और क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक और कानूनी जटिलताएं सामने आ रही हैं। कुछ राज्यों ने दावा किया कि व्यापक प्रतिबंधों के कारण विकास परियोजनाएं, बुनियादी ढांचा और रोजगार प्रभावित हो रहे हैं। कोर्ट ने माना कि मामला केवल पर्यावरण बनाम विकास का नहीं, बल्कि संतुलन और स्पष्टता का है। इसी वजह से शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक सभी पक्षों की दलीलों और वैज्ञानिक तथ्यों की गहराई से समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक स्थिति यथावत रखी जाए।

पर्यावरणविदों की चिंता
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद पर्यावरण विशेषज्ञ और सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर अस्थायी राहत का गलत इस्तेमाल हुआ, तो अरावली क्षेत्र में फिर से अवैध खनन और निर्माण तेज हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अरावली पहले ही अत्यधिक क्षरण (Degradation) का शिकार हो चुकी है। जंगलों की कटाई, पहाड़ियों का समतलीकरण और कंक्रीट संरचनाओं ने इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर दिया है। यदि सख्ती नहीं बरती गई, तो दिल्ली-NCR में प्रदूषण, जल संकट और तापमान वृद्धि और गंभीर हो सकती है।
राज्य सरकारों की दलील
वहीं हरियाणा और राजस्थान सरकारों का कहना है कि वे पर्यावरण संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन पुराने आदेश की वजह से कई वैध परियोजनाएं भी अटक गई हैं। सरकारों ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे सस्टेनेबल डेवलपमेंट के सिद्धांतों के तहत काम करेंगी और किसी भी अवैध गतिविधि को बढ़ावा नहीं देंगी। राज्य सरकारों का यह भी तर्क है कि आधुनिक तकनीक और कड़े नियमों के साथ सीमित विकास संभव है, जिससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को संतुलित रखा जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्यायिक सतर्कता को दर्शाता है। कोर्ट किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उसका आदेश स्पष्ट, व्यावहारिक और निष्पक्ष हो। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला आने वाले समय में पर्यावरण कानूनों की नई परिभाषा तय कर सकता है, जहां संरक्षण और विकास के बीच संतुलन पर जोर दिया जाएगा।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह जल्द ही इस मामले की विस्तृत सुनवाई करेगी। सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत रिपोर्ट, वैज्ञानिक अध्ययन और जमीनी हालात पर जानकारी मांगी जा सकती है। तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह की नई गतिविधि पर सतर्क नजर रखी जाएगी।यह मामला केवल अरावली तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों के लिए नजीर (Precedent) बन सकता है।अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह साबित करता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा सवाल है। अब यह देखना अहम होगा कि अदालत अंतिम फैसले में किस तरह विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करती है।
