By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर। ए. एस. महाविद्यालय देवघर के विज्ञान संकाय में शुक्रवार को 34वां विश्वविद्यालय स्थापना दिवस हर्षोल्लास एवं गरिमामय वातावरण में समारोहपूर्वक मनाया गया। कार्यक्रम में शिक्षक, शिक्षकेत्तरकर्मी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं की सहभागिता रही। समारोह का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. टी. पी. सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन कर तथा झारखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी सिद्धों-कान्हु के तैलचित्र पर माल्यार्पण कर किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय कुलगीत के सामूहिक गायन से हुई, जिससे पूरा वातावरण विश्वविद्यालय गौरव और झारखंडी संस्कृति की भावना से ओत-प्रोत हो गया। इस अवसर पर उपस्थित सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं, शिक्षकेत्तरकर्मियों एवं विद्यार्थियों ने सिद्धों-कान्हु को पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और उनके संघर्ष एवं बलिदान को स्मरण किया।
समारोह को संबोधित करते हुए प्राचार्य डॉ. टी. पी. सिंह ने कहा कि तिलकामांझी विश्वविद्यालय, भागलपुर से अलग होकर 10 जनवरी 1992 को जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी, वह आज झारखंड की धरती पर शिक्षा का एक सशक्त केंद्र बनकर खड़ा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने सीमित संसाधनों से प्रारंभ होकर आज शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं और राज्य के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहा है।
डॉ. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में विश्वविद्यालय केवल पारंपरिक विषयों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि मेडिकल, इंजीनियरिंग, बी.एड., बी.बी.ए., बी.सी.ए., बी.लिब जैसे व्यावसायिक एवं रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों की पढ़ाई भी यहां कराई जा रही है। इन पाठ्यक्रमों से शिक्षा प्राप्त कर विद्यार्थी आज देश-विदेश में विभिन्न प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं, जो विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता और विश्वसनीयता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय की प्रगति केवल भवनों और पाठ्यक्रमों से नहीं, बल्कि वहां कार्यरत शिक्षक, शिक्षकेत्तरकर्मी और विद्यार्थियों की सामूहिक मेहनत से होती है। विश्वविद्यालय की उन्नति में सभी की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है। निश्चय ही विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति राज्य के समग्र विकास में भी विशेष योगदान दे रही है।
कार्यक्रम का सफल संचालन कर रही डॉ. भारती प्रसाद ने अपने वक्तव्य में कहा कि विश्वविद्यालय स्थापना दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर भी है। उन्होंने कहा कि इस दिन हम सभी शिक्षक एवं शिक्षकेत्तरकर्मियों को यह प्रण लेना चाहिए कि हम पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे। किसी भी शैक्षणिक संस्थान की सफलता उसके कर्मियों की कार्यकुशलता, अनुशासन और प्रतिबद्धता पर ही निर्भर करती है।
डॉ. भारती प्रसाद ने विद्यार्थियों से भी आह्वान किया कि वे शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों को आत्मसात करें और समाज एवं राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को केवल डिग्री नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा भी प्रदान करता है।
समारोह के दौरान अन्य वक्ताओं ने भी विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास, वर्तमान उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल, शोध गतिविधियों और विद्यार्थियों की सफलता पर संतोष व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. अशोक कुमार, डॉ. किरण पाठक, डॉ. अरविंद झा, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. पामेला, डॉ. आर. मालाकार, डॉ. हुसैन शेख, डॉ. मुकेश, सुश्री संगीता हेंब्रम, डॉ. अनिल ठाकुर, डॉ. अनिल वर्मा, डॉ. अंजना यादव, डॉ. अनुराधा, डॉ. अभय, डॉ. उमा सिंह, डॉ. राजेश बिसेन, डॉ. सुनीता, डॉ. पूनम ठाकुर, डॉ. इंद्रजीत सहित महाविद्यालय के सभी शिक्षक एवं शिक्षिकाएं उपस्थित रहे।
इसके अतिरिक्त शिक्षकेत्तरकर्मियों में श्री सुनील वर्मा, श्री अमित, श्री उमेश, श्री मुकुल, श्री सिकंदर, श्री दीपक, श्री निशिकांत, श्री राजीव सहित अन्य कर्मचारी भी समारोह में शामिल हुए। कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति ने आयोजन को और भी भव्य बना दिया।
अंत में विश्वविद्यालय के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया। समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि शिक्षा ही समाज और राष्ट्र की प्रगति का सबसे सशक्त माध्यम है।

