By:Vikash Kumar (Vicky)
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बार फिर अपने कड़े बयानों से राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। मुख्यमंत्री ने ‘मियां’ समुदाय को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि उनके कार्यकाल के दौरान इस समुदाय के लोगों को “परेशानी झेलनी पड़ेगी” और राज्य छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उनके इस बयान को अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे से जोड़कर देखा जा रहा है, जो असम की राजनीति में लंबे समय से एक संवेदनशील विषय रहा है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम सरकार अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतेगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे लोगों को राज्य में काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी और कानून के तहत उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री के मुताबिक, असम की जनसंख्या संरचना और संसाधनों पर अवैध घुसपैठ का सीधा असर पड़ा है, जिसे रोकना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

‘मियां’ शब्द को लेकर पहले भी विवाद होता रहा है। यह शब्द मुख्य रूप से असम में बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मुख्यमंत्री के बयान के बाद इस समुदाय में असुरक्षा और आक्रोश का माहौल देखा जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे एक पूरे समुदाय को निशाना बनाने वाला बयान करार दिया है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उनकी सरकार किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि अवैध रूप से राज्य में रह रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि “जो भी व्यक्ति अवैध तरीके से असम में रह रहा है, वह कानून के दायरे में आएगा, चाहे वह किसी भी समुदाय से क्यों न हो।”
असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा दशकों पुराना है। एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) जैसे मुद्दों ने पहले ही राज्य में सामाजिक और राजनीतिक तनाव को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री का ताजा बयान इसी पृष्ठभूमि में आया है, जिसे आने वाले समय में राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।

विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के बयान की कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस और एआईयूडीएफ (AIUDF) सहित कई दलों ने कहा है कि इस तरह के बयान समाज में विभाजन पैदा करते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार विकास, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ऐसे बयान दे रही है।
मानवाधिकार संगठनों ने भी मुख्यमंत्री के बयान पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि किसी भी कार्रवाई में संवैधानिक अधिकारों और मानवाधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए। संगठनों ने यह भी कहा कि अवैध घुसपैठ की जांच कानून के दायरे में होनी चाहिए, न कि सामूहिक रूप से किसी समुदाय को दोषी ठहराया जाए।

हालांकि, मुख्यमंत्री के समर्थकों का मानना है कि हिमंत बिस्वा सरमा राज्य के हितों की रक्षा के लिए कठोर फैसले ले रहे हैं। उनका कहना है कि असम पहले ही सीमित संसाधनों से जूझ रहा है और अवैध घुसपैठ से स्थानीय लोगों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। समर्थकों के अनुसार, सरकार की सख्ती से ही राज्य में कानून-व्यवस्था और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखा जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह बयान आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर दिया गया हो सकता है। असम में अवैध घुसपैठ का मुद्दा हमेशा से चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा रहा है और इस पर सख्त रुख अपनाकर एक खास वर्ग को संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

फिलहाल, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयान के बाद असम की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। यह देखना अहम होगा कि सरकार आगे किस तरह की नीतिगत और कानूनी कार्रवाई करती है और इसका राज्य की सामाजिक एकता पर क्या असर पड़ता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब विपक्ष और सामाजिक संगठन सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे।
