By: Vikash Kumar (Vicky)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में देश की राजनीति का नक्शा बदल दिया है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक बीजेपी ने अपने संगठन को मजबूत करते हुए कई राज्यों में सत्ता हासिल की। लेकिन इन तमाम सफलताओं के बीच एक राज्य ऐसा है, जहां बीजेपी का सपना अब तक अधूरा है—पश्चिम बंगाल।

बंगाल में बीजेपी लगातार अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है, लेकिन सत्ता की चाबी अब भी उसके हाथ से दूर है। सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि देश के कई राज्यों में मजबूत प्रदर्शन करने वाली बीजेपी, बंगाल में सरकार बनाने में अब तक सफल नहीं हो पाई है।

क्षेत्रीय पहचान और बंगाल की राजनीतिक संस्कृति
पश्चिम बंगाल की राजनीति का अपना अलग इतिहास और संस्कृति रही है। यहां लंबे समय तक वामपंथी दलों का शासन रहा, जिसने राज्य की राजनीतिक सोच को प्रभावित किया। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने “बंगाली अस्मिता” और क्षेत्रीय भावनाओं को केंद्र में रखकर राजनीति की।

बीजेपी पर अक्सर “बाहरी पार्टी” होने का आरोप लगता रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने इस नैरेटिव को मजबूती से पेश किया, जिसका असर ग्रामीण और पारंपरिक वोटरों पर साफ दिखाई दिया। इससे बीजेपी के लिए स्थानीय स्तर पर भरोसा कायम करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

ममता बनर्जी की मजबूत पकड़
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य की सबसे प्रभावशाली नेता मानी जाती हैं। उनका जमीनी जुड़ाव, आक्रामक राजनीतिक शैली और संगठन पर मजबूत पकड़ उन्हें बीजेपी के लिए बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनाती है। ममता बनर्जी ने महिला वोटरों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण तबकों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। “लक्ष्मी भंडार”, “कन्याश्री” और “सबुज साथी” जैसी योजनाओं ने तृणमूल कांग्रेस की सामाजिक आधार को मजबूत किया है। इससे बीजेपी को वोट बैंक में सेंध लगाना मुश्किल साबित हुआ है।

अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण
पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक आबादी करीब 27 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। यह वोट बैंक लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा है। बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक ध्रुवीकरण होने से यह वोट बड़े पैमाने पर एकजुट होकर तृणमूल के पक्ष में जाता है।
बीजेपी की हिंदुत्व आधारित राजनीति को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठाते रहे हैं, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय में पार्टी को लेकर संदेह बना रहता है। इसका सीधा फायदा तृणमूल कांग्रेस को मिलता है।

स्थानीय नेतृत्व की कमी
बीजेपी ने बंगाल में तेजी से विस्तार तो किया, लेकिन पार्टी अब भी एक सर्वमान्य स्थानीय चेहरे की तलाश में नजर आती है। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय नेताओं के चेहरे पर चुनाव लड़ा, लेकिन राज्य स्तर पर कोई ऐसा नेता सामने नहीं आ सका, जो ममता बनर्जी को सीधी टक्कर दे सके। स्थानीय स्तर पर मजबूत और लोकप्रिय नेतृत्व की कमी बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक मानी जाती है।

संगठनात्मक मजबूती की चुनौती
बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपने संगठन का तेजी से विस्तार किया है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का जमीनी नेटवर्क अभी भी ज्यादा मजबूत माना जाता है। पंचायत स्तर तक फैला तृणमूल का संगठन चुनावी रणनीति में उसे बढ़त देता है।
ग्रामीण इलाकों में बीजेपी को अब भी बूथ स्तर पर मजबूती हासिल करने की जरूरत महसूस की जाती है।

हिंसा और राजनीतिक माहौल
पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा के आरोप अक्सर लगते रहे हैं। बीजेपी ने कई बार आरोप लगाया कि उसके कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है, जबकि तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को खारिज करती रही है। ऐसे माहौल में संगठन खड़ा करना बीजेपी के लिए आसान नहीं रहा है, खासकर उन इलाकों में जहां पार्टी की जड़ें अभी कमजोर हैं।

बदलता समीकरण, बढ़ती चुनौती
हालांकि बीजेपी बंगाल में सत्ता से दूर रही है, लेकिन पार्टी का वोट प्रतिशत और सीटें पिछले कुछ चुनावों में तेजी से बढ़ी हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी की मौजूदगी सीमित थी, वहीं 2019 में पार्टी ने राज्य में मजबूत प्रदर्शन किया।
इससे साफ है कि बीजेपी ने बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर ली है, लेकिन उसे सत्ता तक पहुंचने के लिए अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।

आगे का रास्ता
विश्लेषकों का मानना है कि अगर बीजेपी को बंगाल में सरकार बनानी है, तो उसे स्थानीय मुद्दों, क्षेत्रीय पहचान और जमीनी नेतृत्व पर ज्यादा ध्यान देना होगा। साथ ही संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना और सभी समुदायों में विश्वास कायम करना भी जरूरी होगा।
बंगाल की राजनीति हमेशा से अलग राह पर चली है। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने के बावजूद बीजेपी के लिए यहां की सियासी जमीन अब भी पथरीली बनी हुई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी इस चुनौती को पार कर पाती है या बंगाल की राजनीति का रंग यूं ही अलग बना रहता है।
