बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण में जनता दल (यूनाइटेड) यानी जदयू ने अपनी राजनीतिक रणनीति में “विरासत की राजनीति” पर खास ध्यान केंद्रित किया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में पार्टी ने उन उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जिनके परिवारों का राजनीति में लंबा इतिहास रहा है या जिन्होंने लंबे समय से क्षेत्रीय स्तर पर पकड़ बनाए रखी है।

इस चरण में कुल 122 सीटों पर मतदान 11 नवंबर को होना है, जिनमें से 44 सीटों पर जदयू ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं।
जदयू का फोकस: अनुभव और पारिवारिक विरासत का मिश्रण
नीतीश कुमार की पार्टी ने इस चरण में पुराने चेहरों के साथ-साथ युवाओं को भी मौका दिया है। पार्टी की रणनीति साफ है—जहां मजबूत जनाधार है वहां अनुभवी उम्मीदवार, और जहां बदलाव की मांग है, वहां नई पीढ़ी को आगे बढ़ाया गया है।
इन 44 सीटों में से लगभग 15 सीटें ऐसी हैं, जहां उम्मीदवारों के परिवार दशकों से राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, नालंदा, दरभंगा, गया और समस्तीपुर जैसे जिलों में पुराने राजनीतिक घरानों के वारिस इस बार चुनावी मैदान में हैं।
चार पूर्व सांसद भी मैदान में
जदयू ने इस चरण में चार पूर्व सांसदों को उम्मीदवार बनाया है, जिनके अनुभव का लाभ पार्टी को मिलने की उम्मीद है। इनमें से दो उम्मीदवार पूर्व में लोकसभा चुनाव हार चुके हैं, लेकिन अब विधानसभा चुनाव के जरिए राजनीतिक वापसी की कोशिश में हैं।
इन उम्मीदवारों को जनता के बीच “अनुभव की पूंजी” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
पहली बार चुनाव लड़ रहे युवा चेहरे
विरासत की राजनीति के बीच नई पीढ़ी को भी जदयू ने मौका दिया है। लगभग 12 उम्मीदवार ऐसे हैं जो पहली बार चुनावी मैदान में उतर रहे हैं। इनमें कई छात्र राजनीति से निकले हैं और जदयू युवा मोर्चा में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं।
नीतीश कुमार ने हाल के महीनों में पार्टी के अंदर युवाओं की भागीदारी पर जोर दिया है, जिससे संगठन को नई ऊर्जा मिली है।
नीतीश कुमार का ‘विकास और विरासत’ फॉर्मूला
नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू इस चुनाव में “विकास और विरासत” का संतुलन बनाना चाहती है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि “जदयू का मकसद केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि स्थिरता और अनुभव के साथ बिहार को आगे ले जाना है।”
दूसरे चरण के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कई रैलियों में कहा कि “बिहार ने विकास देखा है, और अब उसे स्थिरता चाहिए। जदयू वही भरोसा है जिसने राज्य को बुनियादी ढांचा, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की दिशा दी है।”
मुख्य मुकाबला: जदयू बनाम राजद और बीजेपी
दूसरे चरण की 122 सीटों में से अधिकांश पर मुकाबला जदयू, राजद, और भाजपा के बीच त्रिकोणीय होने की संभावना है।
कई सीटों पर कांग्रेस और वाम दल भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं।
राजद इस बार युवाओं और बेरोजगारी के मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है, जबकि बीजेपी मोदी सरकार के “डबल इंजन विकास” के नारे पर भरोसा कर रही है।
जदयू अपने अभियान में “काम बोलेगा, वादे नहीं” के नारे के साथ जनता को यह याद दिलाने की कोशिश कर रही है कि राज्य में कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा के सुधार नीतीश सरकार की ही देन हैं।
महिलाओं और पिछड़े वर्गों पर फोकस
जदयू ने अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं और पिछड़े वर्गों को विशेष प्राथमिकता दी है।
44 सीटों में से 12 सीटों पर महिला उम्मीदवार हैं। नीतीश कुमार ने हर रैली में कहा है कि “महिलाओं की भागीदारी से ही समाज आगे बढ़ेगा।”
इसके अलावा, पिछड़े वर्गों से आने वाले प्रत्याशियों की संख्या भी बढ़ाई गई है ताकि सामाजिक समीकरणों का संतुलन बना रहे।
जनता के बीच प्रतिक्रिया
ग्रामीण इलाकों में जदयू उम्मीदवारों के पक्ष में पारिवारिक नाम और नीतीश कुमार की छवि दोनों काम कर रहे हैं।
कई जगहों पर मतदाता “विकास बनाम वादे” की तुलना कर रहे हैं।
हालांकि, युवा मतदाताओं में बेरोजगारी और शिक्षा सुधार जैसे मुद्दे अब भी प्रमुख हैं, और जदयू के सामने यह चुनौती है कि वह उन्हें अपने पक्ष में कैसे कर पाएगी।
विरासत की राजनीति: लाभ या चुनौती?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि “विरासत की राजनीति” जदयू के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है।
जहां पुराने नामों से स्थिरता का संदेश जाता है, वहीं युवाओं में परिवर्तन की चाह भी दिख रही है।
यदि जदयू अपने अनुभवी उम्मीदवारों के साथ नए चेहरों को सही संदेश देने में सफल होती है, तो पार्टी को बड़ा फायदा मिल सकता है।
अंतिम चरण की तैयारी
दूसरे चरण के बाद पार्टी तीसरे चरण की तैयारियों में जुटेगी, जहां नीतीश कुमार की छवि और गठबंधन की रणनीति दोनों की परीक्षा होगी।
वर्तमान चरण में जदयू ने जो “विरासत + विकास” का संदेश दिया है, उसका असर आने वाले चरणों के मतदान पर भी पड़ सकता है।
बिहार चुनाव 2025 के दूसरे चरण में जदयू ने अपने उम्मीदवार चयन में स्पष्ट संकेत दिया है कि पार्टी अब केवल सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि अनुभव, परिवारिक भरोसा और विकास के मिश्रण से जनता के बीच उतर रही है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता “विरासत की राजनीति” को स्वीकार करती है या “परिवर्तन की राजनीति” को मौका देती है।

