नई दिल्ली। वसंत कुंज स्थित एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान से जुड़े यौन शोषण के मामले में आरोपी चैतन्यानंद सरस्वती की न्यायिक हिरासत को पटियाला हाउस कोर्ट ने 14 दिन के लिए और बढ़ा दिया है। कोर्ट ने आरोपी को पेश किए जाने के बाद उसकी हिरासत अवधि 31 अक्टूबर 2025 तक बढ़ाने का आदेश दिया। पुलिस ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी जारी है और कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज किए जाने बाकी हैं। इसके अलावा कुछ तकनीकी सबूतों की भी जांच की जा रही है। अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए हिरासत बढ़ाने का फैसला सुनाया।
क्या है पूरा मामला
दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र के एक प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में 17 छात्राओं ने अपने शिक्षक चैतन्यानंद सरस्वती पर यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया था। छात्राओं का कहना है कि आरोपी उन्हें अंक देने, परीक्षा में पास कराने और कोर्स पूरा कराने के नाम पर अनुचित हरकतें करता था। मामला तब उजागर हुआ जब एक छात्रा ने संस्थान के अंदर हुए उत्पीड़न की जानकारी अपने परिवार को दी। इसके बाद कई और छात्राओं ने भी साहस जुटाकर अपने अनुभव साझा किए। छात्राओं के बयान के आधार पर वसंत कुंज नॉर्थ थाने में FIR दर्ज की गई।
जांच में सामने आए अहम तथ्य
दिल्ली पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने अब तक की जांच में पाया कि आरोपी ने संस्थान के कुछ दस्तावेजों में भी जालसाजी की थी। बताया जा रहा है कि चैतन्यानंद ने फर्जी प्रमाणपत्र और सिफारिश पत्र तैयार करवाए थे ताकि संस्थान में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रख सके।पुलिस ने आरोपी के लैपटॉप और मोबाइल फोन को जब्त कर लिया है। इनमें से कई आपत्तिजनक चैट्स और ईमेल्स मिलने की बात सामने आई है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, आरोपी ने कुछ छात्राओं को धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा के बहाने अपने पास बुलाया और फिर उनका शारीरिक शोषण किया।
पुलिस की कार्रवाई और कोर्ट का रुख
पुलिस ने बताया कि जांच के दौरान 17 छात्राओं के बयान 164 CrPC के तहत दर्ज किए जा चुके हैं। हालांकि, कुछ और छात्राओं के बयान और फॉरेंसिक रिपोर्ट अभी बाकी हैं। इसी कारण जांच अधिकारी ने अदालत से अधिक समय की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि यौन शोषण के ऐसे गंभीर मामलों में जांच पूरी होने तक आरोपी को हिरासत में रखना आवश्यक है। अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि सभी गवाहों के बयान जल्द से जल्द दर्ज किए जाएं और आरोपपत्र दाखिल करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए।
आरोपी चैतन्यानंद का पक्ष
चैतन्यानंद सरस्वती ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उसका कहना है कि वह “झूठे केस में फंसाया गया है” और यह साजिश उसके खिलाफ चल रही एक संस्थानिक राजनीति का हिस्सा है। उसके वकील ने अदालत से यह भी कहा कि आरोपी शिक्षा और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में लंबे समय से कार्यरत रहा है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वकील ने यह भी दलील दी कि पुलिस के पास उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं।
हालांकि, अदालत ने फिलहाल किसी भी राहत से इनकार कर दिया और कहा कि सबूतों और गवाहों के बयान आने के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा।
छात्राओं की सुरक्षा को लेकर सख्त निर्देश
इस घटना के सामने आने के बाद दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने सभी निजी संस्थानों को छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी किए हैं।
शिक्षा निदेशालय ने कहा कि संस्थानों में CCTV कैमरे, महिला सुरक्षा अधिकारी और हेल्पलाइन सिस्टम अनिवार्य रूप से लागू किए जाएं। इसके अलावा, छात्राओं की गोपनीयता को बनाए रखते हुए उनके बयान को सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया है। पुलिस ने भी छात्राओं की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की है।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव
इस मामले ने न सिर्फ शिक्षा जगत बल्कि समाज को भी झकझोर कर रख दिया है। एक शिक्षक, जिसे गुरु का दर्जा दिया जाता है, के खिलाफ इस तरह के आरोपों ने विश्वास और नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो आरोपी को POCSO Act (Protection of Children from Sexual Offences) और IPC की कई धाराओं के तहत सजा हो सकती है। इनमें आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।
अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को
अदालत ने आरोपी को 31 अक्टूबर को फिर से पेश करने का आदेश दिया है। तब तक पुलिस को अपने जांच निष्कर्ष और रिपोर्ट कोर्ट में जमा करनी होगी। फिलहाल आरोपी को तिहाड़ जेल में रखा गया है और उसे अन्य कैदियों से अलग रखा गया है ताकि किसी तरह की झड़प या उत्पीड़न की स्थिति न बने।
चैतन्यानंद सरस्वती का यह मामला शिक्षा संस्थानों में व्याप्त शक्ति के दुरुपयोग और नैतिक पतन का गंभीर उदाहरण बन गया है। अदालत का अगला फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि पुलिस अपनी जांच में क्या ठोस सबूत पेश कर पाती है।
देशभर में लोग अब इस मामले की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के भरोसे का मामला बन चुका है।

