By: Vikash Kumar (Vicky)
कक्षा 8 की एक पाठ्यपुस्तक में ‘Judicial Corruption’ यानी ‘न्यायिक भ्रष्टाचार’ शब्द शामिल किए जाने को लेकर देशभर में विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे न्यायपालिका की छवि पर हमला करार दिया है। अदालत ने इस मामले में सख्त कार्रवाई के संकेत भी दिए हैं, जिससे शिक्षा जगत और कानूनी हलकों में बहस तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान/नागरिक शास्त्र की पुस्तक में शासन व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर एक अध्याय के तहत ‘Judicial Corruption’ शब्द का उल्लेख किया गया था। जैसे ही यह सामग्री सार्वजनिक हुई, विभिन्न वर्गों की ओर से प्रतिक्रिया सामने आने लगी। कुछ लोगों ने इसे शिक्षा के नाम पर न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की कोशिश बताया, जबकि कुछ शिक्षा विशेषज्ञों ने इसे संस्थागत पारदर्शिता और जागरूकता के संदर्भ में उचित ठहराया।
मामला जब अदालत पहुंचा तो Supreme Court of India ने प्राथमिक सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और उसकी गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। यदि पाठ्यपुस्तकों में ऐसे शब्दों का उपयोग बिना उचित संदर्भ और संतुलन के किया जाता है, तो इससे छात्रों के मन में गलत संदेश जा सकता है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार एक व्यापक सामाजिक समस्या है, लेकिन किसी विशेष संस्था को लक्षित करते हुए सामान्यीकृत शब्दों का प्रयोग संवेदनशील मुद्दा बन सकता है। अदालत ने संबंधित शिक्षा बोर्ड और प्रकाशन संस्था से जवाब मांगा है कि इस शब्द को किस संदर्भ और उद्देश्य से शामिल किया गया।
क्या है पूरा विवाद?
जानकारी के मुताबिक, संबंधित अध्याय में लोकतंत्र के चार स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—की भूमिका का उल्लेख किया गया है। इसी संदर्भ में विभिन्न संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा करते हुए ‘Judicial Corruption’ शब्द का उपयोग किया गया।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि कक्षा 8 के विद्यार्थियों के लिए यह शब्दावली अत्यधिक संवेदनशील और जटिल है। उनका तर्क है कि इतनी कम उम्र में छात्रों को संस्थाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण देने से बचना चाहिए।

वहीं शिक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि यदि किसी भी संस्था में भ्रष्टाचार की संभावना पर चर्चा की जाती है तो उसे तथ्यात्मक और संतुलित तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि छात्र आलोचनात्मक सोच विकसित कर सकें।
Supreme Court of India का रुख
सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने कहा कि न्यायपालिका पर विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। यदि पाठ्यपुस्तकों में ऐसे शब्द शामिल किए जाते हैं तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे संदर्भ सहित और संतुलित भाषा में हों।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि पाया गया कि जानबूझकर न्यायपालिका की छवि खराब करने का प्रयास किया गया है, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

शिक्षा बोर्ड का पक्ष
संबंधित शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा है कि पाठ्यक्रम विशेषज्ञों की समिति द्वारा तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य छात्रों को लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली से परिचित कराना है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी शब्दावली पर आपत्ति है तो उसे समीक्षा के लिए भेजा जाएगा।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कुछ विपक्षी दलों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अकादमिक स्वतंत्रता का मुद्दा बताया है, जबकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार पर चर्चा करना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, लेकिन यह भी जरूरी है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता और संवैधानिक मर्यादा का सम्मान बना रहे।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, पाठ्यपुस्तकों में प्रयुक्त भाषा अत्यंत सावधानीपूर्वक चुनी जानी चाहिए। विशेष रूप से किशोर छात्रों के लिए सामग्री तैयार करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह संतुलित, तथ्यपरक और शिक्षाप्रद हो।

आगे क्या?
अब सभी की नजर इस बात पर है कि अदालत के निर्देशों के बाद संबंधित पाठ्यपुस्तक में संशोधन होगा या नहीं। यदि अदालत सख्त रुख अपनाती है तो यह भविष्य में पाठ्यक्रम निर्माण प्रक्रिया के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।
फिलहाल यह विवाद शिक्षा, न्यायपालिका और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में अदालत की अगली सुनवाई और शिक्षा बोर्ड की प्रतिक्रिया इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।

