By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर माँ सरस्वती की पूजा आगामी 23 जनवरी को पूरे जिले में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। इसको लेकर देवघर सहित आसपास के इलाकों में मूर्तिकार इन दिनों पूरी तरह व्यस्त नजर आ रहे हैं। बरमसिया क्षेत्र में स्थित मूर्तिकारों की बस्तियों में सुबह से शाम तक माँ सरस्वती की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का कार्य चल रहा है। ठंड के बीच अब धूप निकलने से मूर्तियों को सुखाने में कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन चुनौतियां अभी भी कम नहीं हुई हैं।

सोमवार से मौसम में हल्का बदलाव देखने को मिला है। ठंड में थोड़ी कमी और खिली धूप के कारण आम लोगों के साथ-साथ मूर्तिकारों ने भी राहत की सांस ली है। वहीं स्कूल-कॉलेजों और मोहल्लों में बच्चे एवं युवा सरस्वती पूजा को लेकर चंदा संग्रह के लिए समूह में निकलते नजर आ रहे हैं। ढोल-नगाड़ों और पूजा की तैयारियों से माहौल अब धीरे-धीरे उत्सवमय बनने लगा है।
मूर्तिकारों के सामने कई समस्याएं
बरमसिया रोड स्थित गोपाल आर्ट के संचालक गोपाल पंडित ने बताया कि इस वर्ष अत्यधिक ठंड के कारण मूर्तियों का निर्माण प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि “मूर्ति निर्माण के लिए जिस तरह की विशेष मिट्टी की जरूरत होती है, वह अब आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती। मिट्टी मंगाने में ज्यादा खर्च और समय दोनों लग रहे हैं।” गोपाल पंडित ने आगे बताया कि मूर्तियों की मांग में भी पहले के मुकाबले कमी आई है। शहरों में पहले जहां हर मोहल्ले में पूजा होती थी, अब वहां गिनती की समितियां ही पूजा का आयोजन कर रही हैं। “जितनी मेहनत और लागत लगती है, उतना मूल्य ग्राहक देने को तैयार नहीं हैं। यह हमारा पुश्तैनी व्यवसाय है, जो करीब 50 वर्षों से चला आ रहा है, लेकिन अब इसे सिर्फ निभाने की स्थिति रह गई है,” उन्होंने दुख जताते हुए कहा।
शहरों में घट रही पूजा, गांवों में कायम है आस्था
कारीगर विजय पंडित का कहना है कि शहरों में सरस्वती पूजा की परंपरा में धीरे-धीरे कमी आई है। पहले जहां स्कूल, कोचिंग सेंटर और मोहल्लों में बड़े स्तर पर पूजा होती थी, अब कई जगहों पर प्रतीकात्मक पूजा तक सिमट गई है। वहीं ग्रामीण इलाकों में अब भी सरस्वती पूजा को लेकर उत्साह देखने को मिलता है। गांवों में युवा वर्ग बढ़-चढ़कर पूजा समिति बनाकर आयोजन करता है। विजय पंडित ने बताया कि उनके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की मांग बिहार के बांका, चांदन, सुईया, कटोरिया, जमुई और घोड़मारा जैसे क्षेत्रों से भी आती है। “बिहार के ग्रामीण इलाकों से आने वाले ऑर्डर हम जैसे कारीगरों के लिए राहत का काम करते हैं,” उन्होंने कहा।
लागत बढ़ी, मुनाफा घटा
मूर्तिकारों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में कच्चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। मिट्टी, बांस, रंग, कपड़ा और सजावटी सामग्री महंगी हो चुकी है, लेकिन मूर्ति की कीमतों में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो पाई है। कई समितियां कम बजट में ही मूर्ति लेना चाहती हैं, जिससे मूर्तिकारों के लिए गुणवत्ता बनाए रखना चुनौती बन गया है।

बच्चों और युवाओं में दिख रहा उत्साह
हालांकि चुनौतियों के बीच सकारात्मक संकेत भी नजर आ रहे हैं। स्कूल-कॉलेजों के छात्र-छात्राएं सरस्वती पूजा को लेकर काफी उत्साहित हैं। मोहल्लों में चंदा संग्रह, पंडाल निर्माण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जा रही है। इससे साफ है कि आस्था और परंपरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
बारह दिन शेष, तैयारी तेज
अब सरस्वती पूजा में महज बारह दिन शेष रह गए हैं। ऐसे में मूर्तिकार दिन-रात मेहनत कर प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। बरमसिया सहित देवघर के अन्य इलाकों में मां सरस्वती की प्रतिमाएं धीरे-धीरे तैयार होकर सड़कों के किनारे नजर आने लगी हैं, जो आने वाले पर्व की याद दिला रही हैं।
बहरहाल, बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में सरस्वती पूजा की परंपरा आज भी जीवंत है। मूर्तिकारों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में फिर से शहरों में भी पूजा का वही पुराना उत्साह लौटेगा और उनका पुश्तैनी कला-व्यवसाय फिर से रफ्तार पकड़ेगा।

