
देवघर, झारखंड – सावन का महीना शुरू होते ही संपूर्ण उत्तर भारत का माहौल भक्तिमय हो उठता है। चारों ओर “बोल बम” के जयकारे गूंजने लगते हैं, और हरियाली के बीच नारंगी वस्त्रों में लिपटे श्रद्धालुओं की टोलियां कांवर उठाए बाबा बैद्यनाथधाम, देवघर की ओर बढ़ती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कांवर यात्रा सिर्फ सावन में ही क्यों होती है, और क्यों लाखों की संख्या में शिवभक्त देवघर का रुख करते हैं?
इस विशेष रिपोर्ट में हम जानेंगे देवघर में सावन माह में कांवर यात्रा होने का धार्मिक, पौराणिक, सामाजिक और भौगोलिक कारण, साथ ही इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों को भी उजागर करेंगे।
बाबा बैद्यनाथधाम: शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक
देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर, भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवान रावण द्वारा लाए गए शिवलिंग की स्थापना हुई थी। यह शिवलिंग ‘कामना लिंग’ भी कहलाता है, क्योंकि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुरादें पूर्ण होती हैं।
सावन: शिवभक्ति का सबसे पवित्र महीना
सावन माह को भगवान शिव का प्रिय मास माना गया है। पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला, तो भगवान शिव ने उसे पी लिया और उनके शरीर में विष की गर्मी को कम करने के लिए देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। यही परंपरा आज भी कांवर यात्रा के रूप में निभाई जाती है।
श्रावण सोमवारी, यानी सावन के सोमवार को शिव को जल चढ़ाना विशेष फलदायी माना जाता है।
गंगाजल और कांवर यात्रा की परंपरा
कांवर यात्रा में श्रद्धालु सुल्तानगंज (भागलपुर, बिहार) से गंगाजल भरकर लगभग 105 किलोमीटर की पदयात्रा करके देवघर पहुंचते हैं।
🔹 सुल्तानगंज की खासियत यह है कि गंगा नदी यहां
उत्तरवाहिनी है, यानी उत्तर दिशा की ओर बहती है, जो अत्यंत शुभ मानी जाती है।
🔹 श्रद्धालु यहां से जल भरकर कांवर (लकड़ी की दो छड़ों पर लटकी बाल्टी जैसी संरचना) में रखकर नंगे पांव बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए निकलते हैं।
🔹 यह यात्रा पूरी निष्ठा, ब्रह्मचर्य और नियमों के साथ की जाती है।
पौराणिक कथा: रावण और शिवलिंग
एक प्रमुख कथा के अनुसार, रावण भगवान शिव को अपने लंका ले जाना चाहता था। उसने शिवजी को प्रसन्न कर लिया और उनसे शिवलिंग साथ चलने का वर प्राप्त किया। परंतु शिव ने शर्त रखी कि उसे कहीं भी नीचे नहीं रखना होगा, वरना वह वहीं स्थापित हो जाएगा। रास्ते में रावण को लघुशंका लगी, और उसने एक ग्वाले को शिवलिंग पकड़ने को कहा। ग्वाले ने इंतज़ार न कर पाने की स्थिति में शिवलिंग ज़मीन पर रख दिया और वह वहीं स्थापित हो गया – जो आज बाबा बैद्यनाथ के नाम से जाना जाता है।
कांवर यात्रा और सामाजिक समरसता
कांवर यात्रा न केवल एक धार्मिक प्रक्रिया है, बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक बन चुकी है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं – अमीर-गरीब, जाति-धर्म से ऊपर उठकर। रास्ते में जगह-जगह सेवा शिविर, स्वास्थ्य कैंप, भोजन भंडारे और विश्राम स्थल स्थापित किए जाते हैं।
‘कांवरिया भाईचारा’ की भावना से लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं।
यह यात्रा अनुशासन, समर्पण और सेवा की जीवंत मिसाल बन चुकी है।
सुरक्षा और प्रशासन की तैयारी
हर साल झारखंड सरकार और जिला प्रशासन सावन के महीने में विशेष व्यवस्था करता है।
श्रावणी मेला को लेकर चाक-चौबंद सुरक्षा
हेल्थ कैंप, मोबाइल एम्बुलेंस, CCTV निगरानी
महिला कांवरियों के लिए विशेष इंतजाम
QR कोड वाली ID और GPS आधारित निगरानी
इन सभी प्रयासों का उद्देश्य है कि श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के बाबा के दर्शन कर सकें।
आर्थिक और पर्यटन प्रभाव
श्रावणी मेला और कांवर यात्रा के दौरान देवघर में करोड़ों का कारोबार होता है।
होटल, लॉज, ट्रांसपोर्ट, रिटेल और धार्मिक वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि
देवघर एयरपोर्ट और AIIMS जैसे प्रोजेक्ट से आने वाले वर्षों में यह और बढ़ेगा
देवघर में सावन के महीने में कांवर यात्रा केवल एक परंपरा नहीं, एक जीवंत आस्था है। यह उस विश्वास की अभिव्यक्ति है, जो हर कांवरिया के दिल में बाबा बैद्यनाथ के लिए धड़कता है। सावन के इस पावन महीने में, हर एक कदम श्रद्धा से भरा होता है और हर ‘बोल बम’ की गूंज से आसमान भी शिवमय हो जाता है।

