By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर, झारखंड। शिव विवाह यानी महाशिवरात्रि को लेकर देवघर में जबरदस्त उत्साह और आस्था का माहौल है। विश्वप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा बैद्यनाथ मंदिर में सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाता है। शिवरात्रि से ठीक दो दिन पहले एकादशी तिथि को मंदिर के शिखर पर स्थापित पंचशूल को उतारने की परंपरा निभाई जाती है, जो देवघर की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा है।

एकादशी पर उतारे जाते हैं पंचशूल
शिवरात्रि से दो दिन पूर्व एकादशी तिथि को बाबा बैद्यनाथ मंदिर और माता पार्वती मंदिर के शीर्ष पर लगे पंचशूल को विधिवत उतारा जाता है। यह कार्य विशेष परंपरागत विधि से किया जाता है। पंचशूल को उतारने के बाद उसकी साफ-सफाई की जाती है और मंदिर परिसर में सुरक्षित रखा जाता है। इस दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि पंचशूल को नजदीक से देखने और स्पर्श करने को लेकर लोगों में विशेष उत्साह रहता है।

सरदार पंडा द्वारा होती है विशेष पूजा
शिवरात्रि से एक दिन पूर्व सरदार पंडा द्वारा पंचशूल की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के बाद सभी पंचशूल को पुनः मंदिरों के शिखर पर स्थापित किया जाता है। स्थापना की यह प्रक्रिया पूरी तरह धार्मिक रीति-रिवाज और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न होती है। इस अवसर पर मंदिर प्रांगण में श्रद्धालुओं की भीड़ देखते ही बनती है।

पंचशूल की स्थापना के दौरान श्रद्धालु एक बार इसे स्पर्श करने के लिए आतुर नजर आते हैं। मान्यता है कि पंचशूल का स्पर्श करने से नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पंचशूल का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचशूल सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। इसे शरीर के पांच तत्व—छिति (पृथ्वी), जल, पावक (अग्नि), गगन (आकाश) और समीरा (वायु)—का प्रतीक माना जाता है। ये पंचतत्व जीवन और सृष्टि के मूल आधार हैं। शिवरात्रि के अवसर पर पंचशूल की पूजा इन तत्वों के संतुलन और समृद्धि की कामना के साथ की जाती है।

शिव-पार्वती का गठबंधन भी खोला जाता है
शिवरात्रि से दो दिन पहले बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती के बीच होने वाला प्रतीकात्मक गठबंधन भी खोला जाता है। यह परंपरा देवघर की विशेष पहचान है। शिवरात्रि से एक दिन पूर्व सरदार पंडा द्वारा विधिवत पूजा कर पुनः भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का गठबंधन कराया जाता है।

मान्यता है कि यह गठबंधन वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक है। इस विशेष अनुष्ठान के बाद ही आम श्रद्धालुओं के लिए विवाह संबंधी पूजा-अर्चना की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। हजारों की संख्या में दंपत्ति और नवविवाहित जोड़े इस अवसर पर मंदिर पहुंचकर सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं।
मंदिर परिसर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
पंचशूल उतारने और पुनः स्थापना की परंपरा को देखने के लिए देवघर ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन समिति द्वारा भीड़ नियंत्रण और श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर विशेष व्यवस्था की गई है।

शिवरात्रि के दिन देवघर में कई अन्य विशेष परंपराओं का भी निर्वहन किया जाता है। बाबा बैद्यनाथ धाम में जलार्पण, रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। पूरी रात मंदिर परिसर ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंजता रहता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र
देवघर की शिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। पंचशूल उतारने और पुनः स्थापना की रस्म, शिव-पार्वती गठबंधन की परंपरा और वैदिक विधि-विधान से संपन्न अनुष्ठान इस नगरी को विशेष पहचान देते हैं।

स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा बैद्यनाथ की कृपा से देवघर में शिवरात्रि का आयोजन सदैव शांतिपूर्ण और भव्य होता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

इस वर्ष भी शिव विवाह को लेकर देवघर में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। पंचशूल स्थापना और गठबंधन की परंपरा ने एक बार फिर भक्तों की आस्था को मजबूत किया है। शिवरात्रि के पावन अवसर पर देवघर पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूबा हुआ है।

