By: Vikash Kumar (Vicky)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार उनका निशाना वेनेजुएला नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से बेहद अहम ग्रीनलैंड है। ट्रंप ने दो टूक शब्दों में कहा कि “चाहे प्यार से हो या ताकत से, अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करके रहेगा।” उनके इस बयान ने न केवल अमेरिका की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है।

ग्रीनलैंड क्यों है ट्रंप की प्राथमिकता?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो भले ही बर्फ से ढका हो, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों का विशाल भंडार मौजूद है। यहां रेयर अर्थ मिनरल्स, तेल, गैस और अन्य कीमती प्राकृतिक संसाधन पाए जाते हैं। इसके अलावा ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका, रूस और चीन के बीच सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनाती है। अमेरिका लंबे समय से आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहता है और ग्रीनलैंड इस रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। ट्रंप इससे पहले भी अपने कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन उस वक्त डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकार ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था।
ट्रंप के बयान ने क्यों बढ़ाई चिंता?
डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे अमेरिकी साम्राज्यवादी सोच का खुला प्रदर्शन बताया जा रहा है। “प्यार से या ताकत से” जैसे शब्दों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका किसी भी हद तक जाकर अपने रणनीतिक हित साध सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति को दर्शाता है, जिसमें वह सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक दबाव के जरिए अन्य देशों पर प्रभाव जमाने की कोशिश करते हैं। वेनेजुएला, ईरान, चीन और अब ग्रीनलैंड—ट्रंप की नीति में शक्ति प्रदर्शन प्रमुख रहा है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया
ग्रीनलैंड भले ही एक स्वायत्त क्षेत्र हो, लेकिन यह आधिकारिक रूप से डेनमार्क के अधीन आता है। ट्रंप के इस बयान के बाद डेनमार्क सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आने की संभावना जताई जा रही है। इससे पहले भी डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने कहा था कि “ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है।” ग्रीनलैंड के स्थानीय नेताओं ने भी बार-बार यह स्पष्ट किया है कि वे अपनी स्वतंत्र पहचान और स्वशासन से समझौता नहीं करेंगे। ट्रंप के बयान को वहां की जनता ने संप्रभुता पर हमला बताया है।

वैश्विक राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
ट्रंप के इस बयान से अमेरिका-यूरोप संबंधों में खटास बढ़ सकती है। नाटो सहयोगी डेनमार्क के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना अमेरिका के लिए कूटनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता है। इसके अलावा रूस और चीन भी आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ग्रीनलैंड को लेकर किसी भी तरह का अमेरिकी दबाव वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में आर्कटिक क्षेत्र नया ‘कोल्ड वॉर ज़ोन’ बन सकता है।
क्या यह चुनावी रणनीति है?
अमेरिका में चुनावी माहौल के बीच ट्रंप का यह बयान घरेलू राजनीति से भी जुड़ा माना जा रहा है। ट्रंप अक्सर आक्रामक बयान देकर अपने समर्थक वोट बैंक को साधने की कोशिश करते हैं। “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के तहत वह यह दिखाना चाहते हैं कि अमेरिका किसी भी कीमत पर अपने हितों से समझौता नहीं करेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान ट्रंप की उसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह खुद को मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में पेश करते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान सिर्फ एक देश या द्वीप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की वैश्विक राजनीति की दिशा का संकेत देता है। संसाधनों, रणनीतिक क्षेत्रों और सैन्य प्रभुत्व को लेकर दुनिया में प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है। ऐसे में ट्रंप की यह चेतावनी आने वाले समय में बड़े कूटनीतिक टकराव का कारण बन सकती है।

