By: Vikash Kumar (Vicky)
गाजियाबाद में तीन सगी बहनों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। शुरुआती चर्चाओं और सोशल मीडिया पर चल रही अटकलों में इस घटना को किसी ऑनलाइन गेम, ‘कोरियन लव गेम’ या डिजिटल चैलेंज से जोड़कर देखा जा रहा था। लेकिन पुलिस जांच ने इन सभी दावों को खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि इस दर्दनाक घटना का संबंध किसी ऑनलाइन गेम से नहीं था।

जांच अधिकारियों के मुताबिक, डिजिटल फॉरेंसिक जांच, मोबाइल फोन डाटा, चैट हिस्ट्री और ब्राउज़िंग रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की गई। किसी भी प्रकार का ऐसा गेम, चैलेंज या ऑनलाइन गतिविधि नहीं मिली जो आत्महत्या के लिए उकसाने का संकेत दे। इससे साफ हुआ कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कई बातें भ्रामक थीं।
हालांकि, इस केस ने एक बेहद गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान खींचा है — बच्चों की डिजिटल सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और अभिभावकीय निगरानी की कमी। विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही इस घटना में ऑनलाइन गेम की भूमिका नहीं रही, लेकिन आज का डिजिटल माहौल बच्चों के मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।
डिजिटल दुनिया और बच्चों का मानसिक दबाव
स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक, हर चीज स्क्रीन पर सिमटती जा रही है। ऐसे में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य, उनकी भावनात्मक स्थिति और ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी बेहद जरूरी हो गई है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोरावस्था में बच्चे भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील होते हैं। वे जल्दी प्रभावित होते हैं, तुलना करते हैं और कई बार आभासी दुनिया को ही वास्तविक मान बैठते हैं। अगर परिवार में संवाद की कमी हो, तो बच्चे अपनी परेशानियां भीतर ही भीतर दबाते रहते हैं।

अफवाहें कैसे बन जाती हैं ‘सच’?
गाजियाबाद केस में भी यही हुआ। घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर ‘कोरियन गेम’, ‘ऑनलाइन चैलेंज’ और ‘डिजिटल डेथ गेम’ जैसे शब्द ट्रेंड करने लगे। बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के इन दावों को शेयर किया गया। इससे न सिर्फ भ्रम फैला, बल्कि असली मुद्दों से ध्यान भी भटका। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ऐसी अफवाहें जांच को प्रभावित करती हैं और समाज में अनावश्यक भय का माहौल बनाती हैं।

अभिभावकों की भूमिका क्यों अहम?
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना, उनसे खुलकर बात करना और उनकी भावनाओं को समझना समय की जरूरत है। कई बार बच्चे मानसिक दबाव, डर, अपराधबोध या किसी निजी समस्या से जूझ रहे होते हैं, लेकिन वह माता-पिता से साझा नहीं कर पाते। परिवार में संवाद की कमी, अत्यधिक अपेक्षाएं और अकेलापन बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर कर सकता है।

स्कूल और समाज की जिम्मेदारी
स्कूलों में काउंसलिंग सिस्टम मजबूत होना चाहिए। बच्चों को डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है। समाज को भी अफवाहों से बचते हुए संवेदनशीलता दिखानी होगी।
डिजिटल सुरक्षा के लिए क्या करें?
– बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखें
– उनके ऑनलाइन दोस्तों और गतिविधियों के बारे में जानकारी रखें
– समय-समय पर भावनात्मक बातचीत करें
– किसी भी असामान्य व्यवहार को नजरअंदाज न करें
– जरूरत पड़ने पर काउंसलर की मदद लें

गाजियाबाद ट्रिपल सुसाइड केस ने यह साफ कर दिया कि हर दर्दनाक घटना के पीछे ऑनलाइन गेम या इंटरनेट को दोष देना आसान है, लेकिन सच्चाई अक्सर इससे कहीं ज्यादा जटिल होती है। यह मामला हमें याद दिलाता है कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ डिजिटल मॉनिटरिंग से नहीं, बल्कि भावनात्मक सहयोग, संवाद और समझ से सुनिश्चित होती है।
अफवाहों से दूर रहकर, तथ्यात्मक जानकारी पर भरोसा करना और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना ही इस तरह की घटनाओं को रोकने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।

