By: Vikash Kumar (Vicky)
आज का बचपन पहले जैसा नहीं रहा। गलियों की आवाजें अब नोटिफिकेशन की टन-टन में दब गई हैं। खिलौनों की जगह मोबाइल ने ले ली है और दोस्तों के साथ खेलने की जगह स्क्रीन ने। सवाल यह है कि जब बच्चा अपने सामान्य व्यवहार से अलग दिखने लगता है, गुमसुम रहने लगता है या खुद को कमरे तक सीमित कर लेता है, तब क्या हम सच में उस बदलाव को पहचान पाते हैं? या फिर व्यस्तता का बहाना बनाकर उसे “सामान्य” मानकर नजरअंदाज कर देते हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के व्यवहार में आने वाला सूक्ष्म बदलाव अक्सर किसी गहरे भावनात्मक संकट का संकेत होता है। लेकिन जब परिवार, स्कूल और समाज मिलकर उस संकेत को पढ़ने में असफल हो जाते हैं, तब डिजिटल दुनिया का आकर्षण बच्चों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन जाता है। यही ठिकाना धीरे-धीरे लत में बदल सकता है।
हाल ही में गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की सामूहिक आत्महत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। शुरुआती चर्चाओं में मोबाइल की लत, विदेशी पॉप कल्चर का प्रभाव और सोशल मीडिया का दबाव जैसे कारण सामने आए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ मोबाइल या किसी दूसरे देश की संस्कृति को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है? या फिर हमें यह भी देखना होगा कि बच्चे उस डिजिटल दुनिया में इतने गहरे क्यों उतर गए?

डिजिटल एस्केप: जब स्क्रीन बनती है सहारा
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि बच्चे अक्सर डिजिटल प्लेटफॉर्म को इसलिए चुनते हैं क्योंकि वहां उन्हें तुरंत ध्यान, मान्यता और मनोरंजन मिलता है। अगर घर में संवाद की कमी हो, भावनात्मक समर्थन न मिले या बच्चों को बाहर की दुनिया से जुड़ने का अवसर न दिया जाए, तो वे स्क्रीन की दुनिया में अपनी पहचान ढूंढने लगते हैं।
जब माता-पिता काम की व्यस्तता या अन्य कारणों से बच्चों के साथ गुणवत्ता भरा समय नहीं बिता पाते, तो मोबाइल “बेबीसिटर” की भूमिका निभाने लगता है। शुरुआत में यह सुविधा लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह निर्भरता बन जाती है।
बदलता व्यवहार: चेतावनी के संकेत
यदि बच्चा अचानक चुप रहने लगे, पहले की तरह दोस्तों से न मिले, पढ़ाई में रुचि कम हो जाए या नींद और खाने की आदतों में बदलाव दिखे, तो यह सामान्य नहीं है। यह संकेत हो सकता है कि वह भावनात्मक दबाव, अकेलेपन या डिजिटल ओवरलोड से जूझ रहा है।
स्क्रीन की लत का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि सामाजिक कौशल पर भी पड़ता है। बच्चा वास्तविक संवाद से दूर होता जाता है और आभासी दुनिया को ही असली मानने लगता है।

परिवार और समाज की भूमिका
बच्चों को केवल “स्क्रीन कम करो” कहना समाधान नहीं है। उन्हें विकल्प देना होगा। बाहर खेलने के अवसर, किताबें, रचनात्मक गतिविधियां और सबसे महत्वपूर्ण—परिवार के साथ खुला संवाद।
अगर परिवार बच्चों को स्कूल जाने, दोस्तों से मिलने और नई चीजें सीखने के लिए प्रेरित नहीं करेगा, तो वे सीमित दुनिया में सिमट सकते हैं। ऐसे में डिजिटल कंटेंट उनके लिए प्रेरणा भी बन सकता है और भ्रम भी।
जिम्मेदारी किसकी?
डिजिटल प्लेटफॉर्म, कंटेंट क्रिएटर्स और टेक कंपनियों की अपनी जिम्मेदारी है, लेकिन प्राथमिक जिम्मेदारी परिवार और समाज की ही होती है। बच्चों के लिए सुरक्षित और संतुलित माहौल बनाना जरूरी है।
बच्चों के मन को समझना, उनकी बात सुनना और उन्हें यह एहसास दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं—यह सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। डिजिटल दुनिया को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन उसे संतुलित और सुरक्षित बनाना जरूर संभव है।

समाधान की दिशा
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि घर में “नो-स्क्रीन टाइम” तय करें, खासकर खाने के समय और सोने से पहले। बच्चों के साथ रोज कम से कम 30 से 60 मिनट बिना किसी डिजिटल डिवाइस के बातचीत करें। उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में रुचि लें, लेकिन निगरानी को जासूसी की तरह न बनाएं।
स्कूलों में भी डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता कार्यक्रम जरूरी हैं। बच्चों को यह सिखाना होगा कि ऑनलाइन दुनिया वास्तविक जीवन का विकल्प नहीं, बल्कि एक उपकरण मात्र है।
बचपन को स्क्रीन की गिरफ्त से बाहर निकालने के लिए परिवार, स्कूल और समाज—तीनों को मिलकर काम करना होगा। क्योंकि जब डिजिटल दुनिया का शोर बढ़ता है, तो बच्चों की खामोशी और भी गहरी हो जाती है।
यह लेख सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित सामान्य जानकारी के लिए है। यदि किसी बच्चे में अवसाद, व्यवहार में गंभीर बदलाव या आत्मघाती विचार दिखाई दें, तो तुरंत योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या संबंधित हेल्पलाइन से संपर्क करें।

