By:vikash kumar (vicky)
कर्म और भाग्य का विषय सदियों से मानव जीवन की सबसे बड़ी जिज्ञासाओं में से एक रहा है। अक्सर लोग कठिन परिस्थितियों में कहते हैं कि “यह मेरे भाग्य में था”, जबकि सफलता मिलने पर मेहनत और कर्म की चर्चा होती है। सवाल यह उठता है कि क्या हमारा जीवन पूरी तरह भाग्य पर आधारित है या हमारे कर्म ही हमारी किस्मत लिखते हैं? आइए इस गूढ़ विषय को धर्म और शास्त्रों की दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं।

कर्म क्या है?
कर्म का अर्थ है—हमारे द्वारा किया गया हर कार्य, चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या वाणी से किया गया हो। हिंदू दर्शन में कर्म को तीन भागों में बांटा गया है—संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म। संचित कर्म हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का संग्रह है। प्रारब्ध कर्म वह भाग है जो वर्तमान जीवन में फल के रूप में मिलता है। जबकि क्रियमाण कर्म वर्तमान में किए जा रहे कर्म हैं, जो भविष्य को प्रभावित करते हैं।

भाग्य क्या है?
भाग्य को सामान्य भाषा में किस्मत या नियति कहा जाता है। यह हमारे पूर्व कर्मों का फल माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार भाग्य कोई अचानक होने वाली घटना नहीं, बल्कि पूर्व कर्मों का परिणाम है। यानी जो आज हमारे साथ हो रहा है, वह कभी न कभी किए गए कर्मों का ही फल है।

क्या भाग्य बदला जा सकता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रारब्ध कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है, लेकिन क्रियमाण कर्म के माध्यम से भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि वर्तमान में किए गए अच्छे कर्म आने वाले समय का भाग्य बदल सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि कर्म ही भाग्य का निर्माता है।
शास्त्रों की क्या मान्यता है?
भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म को सर्वोपरि बताया है। उन्होंने कहा है कि मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। फल तो कर्म के अनुसार स्वतः प्राप्त होता है। यही सिद्धांत बताता है कि भाग्य और कर्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
कर्म और भाग्य का संतुलन
जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। इन्हें हम भाग्य कह सकते हैं। लेकिन उन परिस्थितियों में हमारा व्यवहार, निर्णय और प्रयास हमारे कर्म होते हैं। यही कर्म आगे चलकर हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं।

क्यों जरूरी है सकारात्मक कर्म?
सकारात्मक सोच, परिश्रम, ईमानदारी और सेवा भाव से किए गए कर्म जीवन में शुभ परिणाम ला सकते हैं। यदि व्यक्ति केवल भाग्य के भरोसे बैठा रहे और कर्म न करे, तो सफलता मिलना कठिन हो जाता है। इसलिए धर्मग्रंथों में कर्मयोग को सबसे श्रेष्ठ मार्ग बताया गया है।
अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि भाग्य और कर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाग्य पूर्व कर्मों का फल है और वर्तमान कर्म भविष्य का भाग्य बनाते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वही उसके जीवन की दिशा तय करता है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रीय व्याख्याओं पर आधारित है। व्यक्तिगत आस्था और विचार अलग हो सकते

