By:vikash kumar (vicky)
होलिका दहन केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय कृषि परंपरा और ऋतु परिवर्तन से भी गहराई से जुड़ा हुआ पर्व है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होने वाले होलिका दहन में पूजा सामग्री के साथ गेहूं, चना और जौ की हरी बालियां अग्नि में अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा नई फसल के स्वागत, प्रकृति के प्रति आभार और समृद्धि की कामना से जुड़ी मानी जाती है।

नई फसल का स्वागत और कृतज्ञता की भावना
भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। रबी की फसल जैसे गेहूं, जौ और चना इसी समय पककर तैयार होने लगते हैं। किसान होलिका दहन की अग्नि में इन नई बालियों को अर्पित कर ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कि उनकी मेहनत सफल हुई और खेतों में समृद्धि आई। यह एक तरह से प्रकृति और अग्नि देव को धन्यवाद अर्पित करने की परंपरा मानी जाती है।

नई फसल को सीधे उपयोग में लेने से पहले उसे अग्नि को समर्पित करना शुद्धि और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद भुने हुए जौ या गेहूं को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है, जिसे कई स्थानों पर ‘नई फसल का प्रसाद’ कहा जाता है।
पौराणिक कथा से जुड़ा महत्व
होलिका दहन का संबंध भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा से भी है। मान्यता है कि अग्नि में सत्य और भक्ति की जीत हुई थी। इसी कारण अग्नि को पवित्र और रक्षक माना गया। नई फसल को अग्नि में अर्पित करना इस विश्वास का प्रतीक है कि आने वाला समय सुखद और समृद्ध होगा।

स्वास्थ्य से जुड़ा पारंपरिक विज्ञान
ग्रामीण क्षेत्रों में यह भी माना जाता है कि होलिका की अग्नि में भुने गए अनाज का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। ऋतु परिवर्तन के समय शरीर को नई फसल के अनुरूप ढालने के लिए यह एक पारंपरिक तरीका माना जाता था। भुना हुआ जौ और चना पाचन में हल्का और पौष्टिक माना जाता है।
सामूहिकता और सामाजिक एकता का प्रतीक
होलिका दहन के दौरान पूरा गांव या मोहल्ला एकत्रित होता है। लोग मिलकर अग्नि की परिक्रमा करते हैं और नई बालियां अर्पित करते हैं। यह सामूहिक आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। नई फसल को साझा करना समृद्धि को बांटने की भावना को भी दर्शाता है।

कृषि चक्र और ऋतु परिवर्तन का संकेत
फाल्गुन पूर्णिमा के बाद मौसम में बदलाव शुरू हो जाता है। ठंड कम होती है और गर्मी का आगमन होता है। ऐसे समय में नई फसल की शुरुआत और पुरानी नकारात्मकता का अंत प्रतीकात्मक रूप से होलिका दहन में दिखाई देता है। अग्नि में डाली गई हरी बालियां आने वाले कृषि चक्र की सफलता की कामना भी दर्शाती हैं।

आज के आधुनिक दौर में भी यह परंपरा ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में निभाई जाती है। भले ही लोग खेती से सीधे जुड़े न हों, लेकिन नई फसल और समृद्धि की कामना का भाव आज भी कायम है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक प्रथाओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों में परंपराओं में अंतर संभव है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले स्थानीय रीति-रिवाज और परंपरा का ध्यान अवश्य रखें।

