शिशिला गांव का अद्वितीय मंदिर और पवित्र मछलियाँ
कर्नाटक के शिशिला नामक छोटे से गांव में बसा श्री शिशिलेश्वर मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यह मंदिर पश्चिमी घाट की ओर बहने वाली कपिला नदी के किनारे स्थित है, जहां नदी में तैरती मछलियों को पवित्र माना जाता है। स्थानीय लोग इन मछलियों को “भगवान की मछली” मानते हैं और उन्हें पूजा के रूप में खाना खिलाते हैं। इन्हें श्रद्धालु अक्सर चावल या चिरों के रूप में भोग डालते हैं जो मछलियाँ आनंदपूर्वक खाती हैं।

महेसीर मछलियाँ: नदी का पवित्र चिह्न
कपिला नदी में जो मछलियाँ पाई जाती हैं, उनमें प्रमुख रूप से महसीर (Mahseer) प्रजाति की मछलियाँ शामिल हैं। यह मछलियाँ स्थानीय लोगों की आस्था का प्रतीक मानी जाती हैं और इन्हें नदी में नुकसान पहुँचाना पाप का कार्य माना जाता है। इस विश्वास के चलते इस इलाके में मछली पकड़ना प्रतिबंधित है ताकि वे सुरक्षित रहें और बढ़ती रहें।
मछलियों के प्रति आस्था और संरक्षण का मेल
शिशिला मंदिर परिसर को स्थानीय लोग “मात्स्य तीर्थ (Matsya Theertha)” भी कहते हैं। कई वर्षों से यहां मछलियों को खाना खिलाना और उनके सम्मान में पूजा करना परंपरा रही है। गांव में लगभग 40 से अधिक मछली प्रजातियाँ हैं और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय समुदाय ने संरक्षण प्रयास भी शुरू किए हैं, जिससे यह नदी मत्स्य सांभर्य (मछली अभयारण्य) भी बन चुका है।
परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत उदाहरण
यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी जीवंत उदाहरण है। यहां के लोगों ने विश्वास के साथ-साथ नदी और मछलियों की रक्षा के लिए नियम बनाए हैं, जिससे नदी के जीव-जंतुओं की रक्षा होती है और जैव विविधता भी बनी रहती है।

मछलियों को नथ पहनाकर नदी में वापस छोड़ा जाना
कुछ स्थानों पर भक्त ऐसे अनुष्ठान भी करते हैं जिसमें मछलियों को प्रतीकात्मक रूप से नथ (अलंकृत वस्तु) पहनाकर नदी में छोड़ा जाता है। यह परंपरा देवी-देवताओं के सम्मान के साथ-साथ मछलियों के प्रति आस्था और सद्भावना को दर्शाती है। यह अनोखा रीति-रिवाज स्थानीय संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं का प्रतिबिंब है।

