By:Vikash kumar (vicky)
फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला फुलेरा दूज का पर्व प्रेम, भक्ति और उल्लास का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन उत्सव 19 फरवरी को मनाया जा रहा है। विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में इस दिन से होली महोत्सव का शुभारंभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फुलेरा दूज इतनी शुभ तिथि है कि इस दिन बिना पंचांग देखे भी मांगलिक कार्य आरंभ किए जा सकते हैं।

मान्यता है कि विधि-विधान से राधा-कृष्ण की पूजा और व्रत कथा का पाठ करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है, वैवाहिक संबंधों में मधुरता बढ़ती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

ब्रज में क्यों खास है फुलेरा दूज
ब्रजभूमि में फुलेरा दूज का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन राधा और भगवान कृष्ण के दिव्य मिलन का उत्सव मनाया गया और फूलों की होली खेलने की परंपरा प्रारंभ हुई। वृंदावन और बरसाना के मंदिरों में इस दिन विशेष श्रृंगार, भजन-कीर्तन और फूलों की वर्षा के साथ उत्सव मनाया जाता है। भक्तगण राधा-कृष्ण के विग्रहों पर पुष्प अर्पित कर प्रेम और समर्पण का भाव व्यक्त करते हैं।

फुलेरा दूज व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक समय ऐसा आया जब श्रीकृष्ण किसी कारणवश कई दिनों तक वृंदावन नहीं आ सके। उनके वियोग में राधा रानी अत्यंत व्याकुल हो उठीं। गोप-गोपियां उदास रहने लगे और ब्रज की प्रकृति भी मानो शोक में डूब गई। पेड़-पौधे मुरझाने लगे, लताएं सूख गईं और यमुना का जल भी कम होने लगा।

इसी बीच देवर्षि नारद द्वारका पहुंचे और उन्होंने श्रीकृष्ण को ब्रजवासियों की व्यथा सुनाई। नारद जी ने कहा कि कन्हैया, आपके बिना ब्रज की रौनक समाप्त हो गई है। यह सुनकर श्रीकृष्ण का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने तत्काल ब्रज लौटने का निश्चय किया। जब उनके आगमन का समाचार फैला तो पूरा ब्रज आनंद से झूम उठा। माता यशोदा ने उन्हें हृदय से लगा लिया और राधा रानी का मुख कमल प्रसन्नता से खिल उठा।

कथा के अनुसार उसी क्षण श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर राधा रानी पर पुष्प वर्षा की। जैसे ही फूलों की वर्षा हुई, ब्रज की प्रकृति फिर से हरी-भरी हो गई। तभी से फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को फूलों की होली खेलने की परंपरा शुरू हुई और इस तिथि को फुलेरा दूज कहा जाने लगा। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धा से व्रत कथा का पाठ करता है, उसके जीवन में प्रेम, सौभाग्य और सुख का वास होता है।

फुलेरा दूज का धार्मिक महत्व
फुलेरा दूज को अत्यंत शुभ और सिद्ध तिथि माना गया है। इस दिन नए कार्य, सगाई, विवाह या अन्य मांगलिक कार्य प्रारंभ करना शुभ फलदायी होता है। भक्त राधा-कृष्ण का पूजन कर गुलाल और पुष्प अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर मंदिरों में फूलों से होली खेली जाती है, जो दिव्य प्रेम और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक है।

इस दिन व्रत रखने और कथा पढ़ने से वैवाहिक जीवन में प्रेम बना रहता है। जिन लोगों के विवाह में बाधाएं आ रही हों, वे भी श्रद्धापूर्वक इस दिन पूजा करें तो लाभ की प्राप्ति होती है। भक्ति भाव से की गई आराधना से राधा-कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पूजा विधि संक्षेप में
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
घर या मंदिर में राधा-कृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें
फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें
फुलेरा दूज व्रत कथा का पाठ करें

आरती के बाद प्रसाद वितरित करें
फाल्गुन मास की यह द्वितीया प्रेम और आनंद का संदेश देती है। फुलेरा दूज केवल एक पर्व नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का उत्सव है जो हर वर्ष भक्तों को भक्ति और उल्लास से भर देता है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों में परंपराओं और विधियों में भिन्नता संभव है। किसी भी विशेष अनुष्ठान से पूर्व योग्य आचार्य या विद्वान से परामर्श करें।
